Friday, 19 June 2020

                    🌿🌿निंदा से डरे🌱🌱🌿☘

                     🙄🙄अनोखी कथा🤔🤔

एक बार की बात है की एक राजा ने यह फैसला लिया के वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाया करेगा।

एक दिन खीर वाले दूध में सांप ने मुंह डाला और दूध में विष डाल दी और ज़हरीली खीर को खाकर 100 के 100 अंधे व्यक्ति मर गए।

राजा बहुत परेशान हुआ कि मुझे 100 आदमियों की हत्या का पाप लगेगा।

राजा परेशानी की हालत में अपने राज्य को छोड़कर जंगलों में भक्ति करने के लिए चल पड़ा, ताकि इस पाप की माफी मिल सके।

रास्ते में एक गांव आया। राजा ने चौपाल में बैठे लोगों से पूछा की क्या इस गांव में कोई भक्ति भाव वाला परिवार है ? ताकि उसके घर रात काटी जा सके।

चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गांव में दो बहन भाई रहते हैं जो खूब बंदगी करते हैं। राजा उनके घर रात ठहर गया।

सुबह जब राजा उठा तो लड़की सिमरन पर बैठी हुई थी । इससे पहले लड़की का रूटीन था की वह दिन निकलने से पहले ही सिमरन से उठ जाती थी और नाश्ता तैयार करती थी।

लेकिन उस दिन वह लड़की बहुत देर तक सिमरन पर बैठी रही। जब लड़की सिमरन से उठी तो उसके भाई ने कहा की बहन तू इतना लेट उठी है ,अपने घर मुसाफिर आया हुआ है। इसने नाश्ता करके दूर जाना है। तुझे सिमरन से जल्दी उठना चाहिए था।

तो लड़की ने जवाब दिया कि भैया ऊपर एक ऐसा मामला उलझा हुआ था। धर्मराज को किसी उलझन भरी स्थिति पर कोई फैसला लेना था और मैं वो फैसला सुनने के लिए रुक गयी थी, इस लिए देर तक बैठी रही सिमरन पर।

तो उसके भाई ने पूछा ऐसी क्या बात थी। तो लड़की ने बताया कि फलां  राज्य का राजा अंधे व्यक्तियों को खीर खिलाया करता था। लेकिन सांप के दूध में विष डालने से 100 अंधे व्यक्ति मर गए। अब धर्मराज को समझ नहीं आ रही कि अंधे व्यक्तियों की मौत का पाप राजा को लगे , सांप को लगे या दूध नंगा छोड़ने वाले रसोईए को लगे।

राजा भी सुन रहा था। राजा को अपने से संबंधित बात सुन कर दिलचस्पी हो गई और उसने लड़की से पूछा कि फिर क्या फैसला हुआ ?

लड़की ने बताया कि अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया था । तो राजा ने पूछा कि क्या मैं आपके घर एक रात के लिए और रुक सकता हूं ? दोनों बहन भाइयों ने खुशी से उसको हां कर दी।

राजा अगले दिन के लिए रुक गया, लेकिन चौपाल में बैठे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि कल जो व्यक्ति हमारे गांव में एक रात रुकने के लिए आया था और कोई भक्ति भाव वाला घर पूछ रहा था। उस की भक्ति का नाटक तो सामने आ गया है। रात काटने के बाद वो इस लिए नही गया क्योंकि जवान लड़की को देखकर उस व्यक्ति की नियत खोटी हो गई। इसलिए वह उस सुन्दर और जवान लड़की के घर पक्के तौर पर ही ठहरेगा या फिर लड़की को लेकर भागेगा। दिनभर चौपाल में उस राजा की निंदा होती रही।

अगली सुबह लड़की फिर सिमरन पर बैठी और रूटीन के टाइम अनुसार सिमरन से उठ गई। तो राजा ने पूछा- "बेटी अंधे व्यक्तियों की हत्या का पाप किसको लगा ?"
तो लड़की ने बताया कि- "वह पाप तो हमारे गांव के चौपाल में बैठने वाले लोग बांट के ले गए।"

*कथासार* 
निंदा करना कितना घाटे का सौदा है। निंदक हमेशा दुसरों के पाप अपने सर पर ढोता रहता है। और दूसरों द्वारा किये गए उन पाप-कर्मों के फल को भी भोगता है। अतः हमें सदैव निंदा से बचना चाहिए। 
 *कबीर साहेब जी*👇👇
*निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय*।

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Tuesday, 16 June 2020


हिंदू धर्म की मान्यता अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मनाते हैं इस पर्व को मनाने के पीछे बहुत से तर्क हैं स्कंद पुराण में इस दिन व्रत ना करने वाले को जंगल का सर्प और भविष्य पुराण में क्रूर राक्षस बताया गया है और एक मतानुसार इस दिन व्रत करने पर 3 जन्मों के पापों का विनाशक  बताया है !

लेकिन यह सब पवित्र गीता और चारों वेद से परे की बात है क्योंकि जिस समय कृष्ण अवतार हुआ था उस समय किसी भी पुराण उपनिषद और शास्त्र की उत्पत्ति नहीं हुई थी यह केवल मन मुखी विचार है क्योंकि बहुत से विद्वानों ने भी बताया है की जो बातें वेदों और पवित्र गीता से मेल नहीं खाते वह केवल लोक वेद है अर्थात दंत कथाएं l🙈

"तो आइए कृष्ण जी के अवतार के बारे में कुछ विस्तार से जानते हैं".  --->>👴👴👴👴
एक बार जब नारद जी विष्णु जी से अपमानित होने के कारण उन्हें श्राप देते हैं तो उसके फल स्वरुप विष्णु जी त्रेता युग में श्री रामचंद्र जी के रूप में अवतार लेते हैं और जब दशरथ पुत्र रामचंद्र जी बाली का वध करते हैं तो बाली के पूछने पर राम जी ने बाली के वध का बदला चुकाने के लिए द्वापर में श्री कृष्ण जी के रूप में अवतरित होना बताया था|
इस प्रकार श्री कृष्ण जी का जन्म द्वापर में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रात्रि 12:00 बजे उनके कंस मामा के निवास स्थित जेल में हुआ
उसी दिन को "जन्माष्टमी" के रूप में मनाते हैं और फिर कृष्ण जी के अंतिम समय में उन्हें एक मछुआरे द्वारा जहरीले तीर से मारा गया जो कि बाली का बदला था और साथ में 56 करोड़ यादव उनकी आंखों के सामने कटकर मर गए और वे उन्हें बचा न सके.

अब यहां सोचने वाला तथ्य यह है कि कि खुद विष्णु जी ,श्री कृष्ण  जी और श्री रामचंद्र जी कर्म बंधनों में बंधे हुए हैं सरदार जी किस प्रकार मनुष्य पाप और पुण्य को भोक्ता है उसी प्रकार यह भी भोंकते हैं तो क्या यह इन्हें परमात्मा का दर्जा दिया जा सकता है !!

"वेदों और पवित्र गीता" के अनुसार यह संभव नहीं है
 क्योंकि परमात्मा अजर,अमर और अविनाशी है जो कि कर्म बंधनों जीवन मृत्यु और श्राप से मुक्त है

कबीर, राम कृष्ण अवतार हैं, इनका नाहीं संसार।
जिन साहब संसार किया, सो किनहु न जनम्यां नार ll

उपर्युक्त पंक्तियों से आते हैं कि रामचंद्र जी और कृष्ण जी विष्णु जी के अवतार है और इनसे अलग पूर्ण परमात्मा  जिन्होंने समस्त सृष्टि का निर्माण किया है  उनका जन्म व मृत्यु नहीं हुआ और ना ही वे किसी कर्म बंधनों से अधीन है
अतः यह सिद्ध होता है कि परमात्मा इनसे कोई अन्य है जिनका उल्लेख हमारे पवित्र ग्रंथ और वेद और गीता में हुआ है


जिनके लिए  पवित्र गीता जी को बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा का पूर्ण ज्ञान व भक्ति विधि मैं नहीं जानता। अध्याय 15 श्लोक 4 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 व 66 में किसी अन्य परमेश्वर की शरण में जाने को कहा है।(इसका सार यह है कि तत्वदर्शी संत की खोज करो और जैसे भक्ति विधि वह बताए उसी अनुसार करते हुए मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे |
और वह तत्वदर्शी संत की पहचान गीता जी ध्याये 15 के श्लोक 1 से 3 में बताई गई है |
और
पवित्र गीता अध्याय 9 के श्लोक 20, 21 में कहा है कि जो मनोकामना(सकाम) सिद्धि के लिए मेरी पूजा तीनों वेदों में वर्णित साधना शास्त्र अनुकूल करते हैं वे अपने कर्मों के आधार पर महास्वर्ग में आनन्द मना कर फिर जन्म-मरण में आ जाते हैं अर्थात् यज्ञ चाहे शास्त्रानुकूल भी हो उनका एक मात्र लाभ सांसारिक भोग, स्वर्ग, और फिर नरक व चौरासी लाख योनियाँ ही हैं।

जब तक तीनों मंत्र जो कि पवित्र गीता के 17 अध्याय श्लोक 23 में वर्णित है( ओम तथा तत् व सत् सांकेतिक) पूर्ण संत से प्राप्त नहीं होते।
और वर्तमान में इन तीनों मंत्रों जो कि गीता जी अध्याय 17 के श्लोक 23 में वर्णित है को कबीर परमेश्वर के रूप में अवतरित संत रामपाल जी महाराज की दे सकते हैं केवल वही पूरे विश्व में एकमात्र अधिकारी तत्वदर्शी संत है अधिक जानकारी के लिए उनकी वेबसाइट पर विजिट करें
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Tuesday, 9 June 2020

विचार करें योग्य तथ्य यह बुराई ना समझे यह एकदम सत्य और प्रमाणित है
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

जहाँ से पवित्र ईसाई व मुसलमान धर्म प्रथम पुरूष के वंश की शुरूआत हुई वहीं से मार-काट लोभ और लालच द्वेष परिपूर्ण है।
आगे चलकर परंपरा में ईसा मसीह जी का जन्म हुआ। इनकी पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पूज्य पिता जी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। इस पर यूसुफ ने आपत्ति की तथा मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ ने डर के मारे मरियम का त्याग न करके उसके साथ पति-पत्नी रूप में रहे। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने ईसा को जन्म दिया। हजरत ईसा से पवित्र ईसाई धर्म की स्थापना हुई। ईसा मसीह के नियमों पर चलने वाले भक्त आत्मा ईसाई कहलाए तथा पवित्र ईसाई धर्म का उत्थान हुआ।

"प्रमाण के लिए कुरान शरीफ में सूरः मर्यम-19 में तथा पवित्र बाईबल में मती रचित सुसमाचार मती=1:25 पृष्ठ नं. 1-2 पर"
इससे यह प्रमाणित होता है कि ईसा मसीह जी परमात्मा नहीं है पूर्ण परमात्मा अन्य है क्योंकि उनका जन्म हुआ है वे देवपुत्र थे|

"(उत्पत्ति ग्रन्थ पृष्ठ नं. 2 पर, अ. 1:20 - 2:5 पर)"
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उत्पति विषय में लिखा है कि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया। इससे सिद्ध है कि प्रभु भी मनुष्य जैसे शरीर युक्त है तथा छः दिन में सृष्टी रचना करके सातवें दिन तख्त पर जा विराजा।

"बाइबल - उत्पत्ति(Genesis)"
1:29 -
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फिर परमेश्वर ने उन से कहा, सुनो, जितने बीज वाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं:

1:30 - और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगने वाले जन्तु हैं, जिन में जीवन के प्राण हैं, उन सब के खाने के लिये मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं; और वैसा ही हो गया।

"बाइबिल अय्यूब 36: 5 के अनुसार"
 पूर्ण परमात्मा
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अय्यूब 36:5 (और्थोडौक्स यहूदी बाइबल - OJB)
परमेश्वर कबीर (शक्तिशाली) है, किन्तु वह लोगों से घृणा नहीं करता है।
परमेश्वर कबीर (सामर्थी) है और विवेकपूर्ण है।

बाइबल ने भी स्पष्ट किया है की प्रभु का नाम कबीर है।

अनुवाद कर्ताओ नें कबीर की जगह शक्तिशाली व सामर्थ वाला लिख दिया है। वास्तव में परमात्मा का नाम कबीर है। वेदो में, भगवद गीता में, श्री गुरु ग्रंथ साहिब में और कुरान शरीफ में भी परमात्मा का नाम कबीर है।

और अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गई वेबसाइट पर विजिट करें
https://www.jagatgururampalji.org/hi/

           धन्यवाद🙏🙏
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🌸 "जेल" शब्द अगर किसी आदमी के चरित्र से जुड़ जाता है तो उसकी गरिमा पर सवाल उठने लगता है, और बदनामी का दाग़ ही लग जाता है!

🌸 किसी व्यक्ति के जेल जाने के बाद उसे घृणा या संदेह है कि निगाह से देखा जाना लाजमी है |

🌸 जेल जाने के भी विविध कारण हो सकते हैं और कभी-कभी उद्देश्य भी |

🌸 व्यक्ति दुराचारी, भ्रष्टाचारी, दुष्कर्मी, चोर, चोर, वाला भी "जेल" जाता है, और ऐसे व्यक्ति से घृणा करना या उसकी बेगुनाही पर संदेह करना स्वाभाविक है |

🚨 लेकिन जरुरी नहीं की जेल जाने वाला हर व्यक्ति कुकर्मी हो, कुछ लोग परमार्थ और समाज सुधार के उद्देश्य को पुरा करने के लिए भी "जेल" जैसी प्रताड़नाये स्वीकार करते है |

🌸 जहाँ एक ओर चंद्र शेखर आजाद, भगत सिंह, जैसे देश-प्रेमी हंसते-हंसते फांसी चढ़ गए तो वही दुसरी ओर महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रपिता भी जेल भोगकर परमार्थ मे "जेल" जाने की मिशाल कायम कर गए |

🌸 श्री कृष्ण! जी का तो जन्म ही जेल मे हुआ था, फिर भी इंसान आज उन्हे धिक्कारने की बजाय पूजता है |

🌸 ईसा मसीह ने "सत्य" कहा तो उसी जनता ने उन्हे शूली पर टांग दी, और वर्तमान मे उन्हे GODकहकर संबोधित किया है |

🌸 एक विदेशी व्यक्ति "निकोलस" ने शोध मे पता लगाया की धरती घुमती है | इसी जनता ने निकोलस को झुठा बताकर उसे फांसी पर चढ़ा दिया, लेकिन कुछ समय पश्चात जब यह बात सच साबित हुई तो इतिहास के पन्नों पर आज भी निकोलस का नाम सुनहरे शब्दो मे दर्ज है |

🌟 वास्तविकता तो यह है की जब कभी भी किसी महान पुरुष ने जनहित मे किसी देवी सत्य को को उजागर करके जन-मानस को सच का आइना दिखाना चाहा तो इसी जनता द्वारा ऐसे महापुरुषो को प्रताड़ित  किया गया।

🔥 ठीक इसी तरह संत रामपाल जी महाराज ने एक महान पुरुष की भूमिका निभाई है और सभी  को एक नई चेतना प्रदान करके और ज्ञान के गूढ़ रहस्य उजागर करके समाज को बहुमुल्य सत्ज्ञान प्रदान करने की कोशिश की है, लेकिन भोली जनता के सहयोग के बजाय अलोचना। शुरू कर दिया |

✨ संत रामपाल जी महाराज का गुनाह सिर्फ इतना है की उन्होने जनहित मे अपना समुल अस्तित्व न्योछावर द्वारा जनता की भलाई सोची |

✨ उन्होने घर-परिवार से सक्षम होते हुए भी समाज को अपना संपुर्ण जीवन सौंप दिया, और समय अभाव के चलते इंजीनियर की नौकरी त्यागकर मनुष्य को दुखो के चंगुल से छुड़ाने और घर-घर तक सतभक्ति का संदेश पहुँचाने की ठान ली |

✨ वह सत-भक्ति अनादि काल से किसी भी ,ऋषी, मुनि, संत महंतो को समझने मे नहीं आई, और ना ही इस रहस्य को समझने या समझाने मे वह सक्षम रहा |

✨ जिसके परिणाम स्वरुप ये नकलियो की अज्ञानता की सच्चाई समाज के सामने आने लगी और बोखलाकर संत रामपाल जी महाराज के खिलाफ साजिश रचने लगे |

✨ संत रामपाल जी महाराज ने सभी सदग्रंथ जैसे वेद, शास्त्र, कुरान, गुरुग्रंथ और बेलबल अदि सदग्रंथो का गहन अध्ययन किया और यह पता लगाया आखिरकार असली सतभक्ति विधि और मंत्र क्या है, जिससे मनुष्य सुखी भी होंगे और पुर्ण मोक्ष पाकर  जन्म मरण के भारी रोग से पूर्णत: छुटकारा पा सकेंगे |

✨✨ यह रहस्य संत रामपालजी महाराज के अतिरिक्त कोई ना निष्फल कर दिया, तो वर्तमान के नकली संत, महंत, कथाकार, धर्म धर्मगुरु, अज्ञानी शँकराचार्य, और अध्यात्म के नकली ठेकेदारो को अपना पतन प्रत्यक्ष दिखने लगा धर्म की झूठी दुकानें  बंद होते देख इन ज्ञानहीन संतो ने संत रामपाल जी महाराज की आवाज़ को पुरी तरह दबाने का भरसक प्रयास किया, जिसका परिणाम आज आपके सामने है की संत रामपालजी महाराज आज "जेल" मे है |

सदगुरु पृथ्वी पर संघर्ष करके समाज को सत ज्ञान से अवगत करवाने के लिए आते है।
                                     धन्यवाद
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Sunday, 7 June 2020

#अवश्य_जानिये...👇👇


1..इस अथाह ब्रह्माण्ड का रचयिता कौन है ?
2..क्या इसकी रचना विज्ञान के बिग-बैंग थ्योरी के आधार पर हुई है या इसको रचने वाला परमात्मा है ?
3..पूर्ण परमात्मा कौन है? कहाँ रहता है? कैसे मिलता है?
4..पूर्ण परमात्मा साकार है या निराकार?
5..मोक्ष क्या है, हमें मोक्ष की आवश्यकता क्यों पडती है?
6..जीव, ब्रह्म, माया क्या है ?
7..आत्मा और मन क्या है ?
8..आत्मा परमात्मा का अंश है फ़िर ये शैतान मन किसका अंश है ?
9..कहते है परमात्मा सुख का सागर है फ़िर भी सब जीव इतने दुखी क्यों है ?
10..परमात्मा ने आत्माऐं बनायी थी फ़िर आत्मा के ऊपर ये शरीर (जो कि दुख का मूल कारण है) किसने चढ़ा दिया तथा इस अमर आत्मा को पशु-पक्षी एवं कीडे-मकोडे के शरीर में क्यों डाल दिया गया ?
11..हमको जन्म देने व मारने में किस प्रभु का स्वार्थ हैं ?
12..ब्रह्मा, विष्णु, महेश कौन है तथा इनके माता-पिता कौन है ?
13..इनकी उत्पत्ति कैसे हुई ? और इनकी आयु कितनी है ?
14..गीता व पुराणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, महेश अजर-अमर नहीं हैं, क्यों ?
15..ब्रह्मा विष्णु महेष किसकी भक्ति करते है ?
16..दुर्गा जी के पति का क्या नाम
है ?
17..द्वापर युग में दुर्गा जी ने द्रौपदी के रूप मे जन्म क्यो लिया ?
18..दुर्गा जी ने ब्रह्मा जी को शाप एवं विष्णु जी को वरदान क्यों दिया ?
19..ब्रह्मा जी की पूजा क्यो नही होती ?
20..शिव जी का एक जन्म परन्तु पार्वती जी के 108 जन्म ऐसा क्यों ?
21..अमरनाथ की कथा का क्या रहस्य है ?
22..तीर्थ और धाम क्या है ?
23..प्रलय और महा-प्रलय में क्या अन्तर है ?
24..तत्त्वज्ञान क्या है तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करने वाले तत्त्वदर्शी संत (सतगुरु) की क्या पहचान है ?(शास्त्रानुसार)
25..वास्तव में गीता जी का ज्ञान किसने बोला था ?
26..गीता का ज्ञान देने वाला प्रभु गीता अध्याय 18 के श्लोक 62 में अर्जुन को किस अन्य 'पूर्ण परमात्मा' की शरण में जाने को कह रहा है ?
27..गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में ये विराट रूप दिखाकर
कहता है कि हे अर्जुन 'मैं काल हूँ'। ये काल कौन है ?
28..क्या आप जानते है जिसको हम आज तक भगवान मानकर पूजते आये है वो हमें खाने वाला काल है ?
29..हम सब आत्माऐं काल के जाल में कैसे फँसी ?
30..महाभारत के युद्ध के बाद श्री कृष्ण जी गीताजी का ज्ञान क्यों भूल गये ?
31..गीता जी में तीनों देवताओं रजगुण
ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी की पूजा करने वालों को मनुष्य में
नीच एवं बुद्धिहीन क्यों कहा ?
32..गीता जी अध्याय 15 श्लोक 16 में वर्णित तीनों देवताओं से उपर 'क्षर ब्रह्म' तथा 'अक्षर ब्रह्म' कौन है तथा श्लोक 17 में इन दोनों से परे पूर्ण परमात्मा 'परम अक्षर ब्रह्म' कौन है ?
33..ईश, ईश्वर, परमेश्वर या ब्रह्म, परब्रह्म, पारब्रह्म में क्या भेद हैं ?
34..ॐ, तत्, सत क्या हैं ?
35..ॐ(ब्रह्म), तत्(परब्रह्म), सत(पारब्रह्म) इन सांकेतिक शब्दों का क्या अर्थ है ?
36..शास्त्रों के अनुसार साधना के लाभ व शास्त्रविरुद्ध साधना से क्या हानि है ?
37..हम सभी आत्माएं कहाँ से अाई है ?
38..हम सभी आत्माओं को 84 लाख योनियाँ क्यों भोगनी पडती है ?
39..क्या ब्रह्मा, विष्णु, महेश चौरासी लाख योनियों से मुक्त हैं ?
40..पूर्ण सन्त(सदगुरु) की क्या पहचान है? उसके क्या लक्षण है?
41..भारत के एक सन्त के बारे में नास्त्रेदमस व फ्लोरेंस की भविष्यवाणियाँ सत्य सिद्ध हुई। वह महान सन्त(शायरन/धार्मिक नेता) कौन है?

42..विश्व प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं के अनुसार 21वीं सदी के शुरुआत में हिन्दुस्तान में एक सन्त के नेतृत्व में महान परिवर्तन होगा, वह सन्त हिन्दुस्तान की धरती पर स्वर्ण युग लायेगा। वह महान सन्त कौन है?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रमाण सहित जानने के लिये "ज्ञान गंगा" पुस्तक अवश्य पढ़े।

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Saturday, 6 June 2020



श्री शिव महापुराण से सार विचार
अध्याय 6, रूद्रसंहिता, प्रथम खण्ड(सृष्टी) से निष्कर्ष‘

अपने पुत्र श्री नारद जी के श्री शिव तथा श्री शिवा के विषय में पूछने पर श्री ब्रह्मा जी ने कहा (पृष्ठ 100 से 102) जिस परब्रह्म के विषय में ज्ञान और अज्ञान से पूर्ण युक्तियों द्वारा इस प्रकार विकल्प किये जाते हैं, जो निराकार परब्रह्म है वही साकार रूप में सदाशिव रूप धारकर मनुष्य रूप में प्रकट हुआ। सदा शिव ने अपने शरीर से एक स्त्री को उत्पन्न किया जिसे प्रधान, प्रकृति, अम्बिका, त्रिदेवजननी (ब्रह्मा, विष्णु, शिव की माता) कहा जाता है। जिसकी आठ भुजाऐं हैं।

‘‘श्री विष्णु की उत्पत्ति‘‘
जो वे सदाशिव हैं उन्हें परम पुरुष, ईश्वर, शिव, शम्भु और महेश्वर कहते हैं। वे अपने सारे अंगों में भस्म रमाये रहते हैं। उन काल रूपी ब्रह्म ने एक शिवलोक नामक (ब्रह्मलोक में तमोगुण प्रधान क्षेत्र) धाम बनाया। उसे काशी कहते हैं। शिव तथा शिवा ने पति-पत्नी रूप में रहते हुए एक पुत्र की उत्पत्ति की, जिसका नाम विष्णु रखा। अध्याय 7, रूद्र संहिता, शिव महापुराण (पृष्ठ 103, 104)।

”श्री ब्रह्मा तथा शिव की उत्पत्ति“
अध्याय 7, 8, 9 (पृष्ठ 105-110) श्री ब्रह्मा जी ने बताया कि श्री शिव तथा शिवा (काल रूपी ब्रह्म तथा प्रकृति-दुर्गा-अष्टंगी) ने पति-पत्नी व्यवहार से मेरी भी उत्पति की तथा फि मुझे अचेत करके कमल पर डाल दिया। यही काल महाविष्णु रूप धारकर अपनी नाभि से एक कमल उत्पन्न कर लेता है। ब्रह्मा आगे कहता है कि फिर होश में आया। कमल की मूल को ढूंढना चाहा, परन्तु असफल रहा। फिर तप करने की आकाशवाणी हुई। तप किया। फिर मेरी तथा विष्णु की किसी बात पर लड़ाई हो गई। (विवरण यहाँ पर) तब हमारे बीच में एक तेजोमय लिंग प्रकट हो गया तथा ओ3म्-ओ3म् का नाद प्रकट हुआ तथा उस लिंग पर अ-उ-म तीनों अक्षर भी लिखे थे। फिर रूद्र रूप धारण करके सदाशिव पाँच मुख वाले मानव रूप में प्रकट हुए, उनके साथ शिवा (दुर्गा) भी थी।

फिर शंकर को अचानक प्रकट किया (क्योंकि यह पहले अचेत था, फिर सचेत करके तीनों को इक्कठे कर दिया) तथा कहा कि तुम तीनों सृष्टी-स्थिति तथा संहार का कार्य संभालो।

रजगुण प्रधान ब्रह्मा जी, सतगुण प्रधान विष्णु जी तथा तमगुण प्रधान शिव जी हैं। इस प्रकार तीनों देवताओं में गुण हैं, परन्तु शिव (काल रूपी ब्रह्म) गुणातीत माने गए हैं (पृष्ठ 110 पर)।

सार विचार:- उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि काल रूपी ब्रह्म अर्थात् सदाशिव तथा प्रकृति (दुर्गा) श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव के माता पिता हैं। दुर्गा इसे प्रकृति तथा प्रधान भी कहते हैं, इसकी आठ भुजाऐं हैं। यह सदाशिव अर्थात् ज्योति निरंजन काल के शरीर अर्थात् पेट से निकली है। ब्रह्म अर्थात् काल तथा प्रकृति (दुर्गा) सर्व प्राणियों को भ्रमित रखते हैं। अपने पुत्रों को भी वास्तविकता नहीं बताते। कारण है कि कहीं काल (ब्रह्म) के इक्कीस ब्रह्मण्ड के प्राणियों को पता लग जाए कि हमें तप्तशिला पर भून कर काल (ब्रह्म-ज्योति निरंजन) खाता है। इसीलिए जन्म-मृत्यु तथा अन्य दुःखदाई योनियों में पीडि़त करता है तथा अपने तीनों पुत्रों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी से उत्पत्ति, स्थिति, पालन तथा संहार करवा कर अपना आहार तैयार करवाता है। क्योंकि काल को एक लाख मानव शरीरधारी प्राणियों का आहार करने का शाप लगा है, कृपया श्रीमद् भगवत गीता जी में भी देखें ‘काल (ब्रह्म) तथा प्रकृति (दुर्गा) के पति-पत्नी कर्म से रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव की उत्पत्ति।

          धन्यवाद,

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Thursday, 4 June 2020

 काशी भण्डारे में हुआ करिश्मा.....



एक अन्य करिश्मा जो उस भण्डारे में हुआ वह जीमनवार (लंगर) तीन दिन तक चला था। दिन में प्रत्येक व्यक्ति कम से कम दो बार भोजन खाता था। कुछ तो तीन-चार बार भी खाते थे क्योंकि प्रत्येक भोजन के पश्चात् दक्षिणा में एक मौहर (10 ग्राम सोना) और एक दौहर (कीमती सूती शॉल) दिया जा रहा था।
इस लालच में बार-बार भोजन खाते थे। तीन दिन तक 18 लाख व्यक्ति शौच तथा पेशाब करके काशी के चारों ओर ढे़र लगा देते। काशी को सड़ा देते। काशी निवासियों तथा उन 18 लाख अतिथियों तथा एक लाख सेवादार जो सतलोक से आए थे। उस गंद का ढ़ेर लग जाता, श्वांस लेना दूभर हो जाता, परंतु ऐसा महसूस ही नहीं हुआ। सब दिन में दो-तीन बार भोजन खा रहे थे, परंतु शौच एक बार भी नहीं जा रहे थे, न पेशाब कर रहे थे। इतना स्वादिष्ट भोजन था कि पेट भर-भरकर खा रहे थे। पहले से दुगना भोजन खा रहे थे। हजम भी हो रहा था। किसी रोगी तथा वृद्ध को कोई परेशानी नहीं हो रही थी। उन सबको मध्य के दिन चिंता हुई कि न तो पेट भारी है, भूख भी ठीक लग रही है, कहीं रोगी न हो जाऐं। सतलोक से आए सेवकों को समस्या बताई तो उन्होंने कहा कि यह भोजन ऐसी जड़ी-बूटियां डालकर बनाया है जिनसे यह शरीर में ही समा जाएगा। हम तो प्रतिदिन यही भोजन अपने लंगर में बनाते हैं, यही खाते हैं। हम कभी शौच नहीं जाते तथा न पेशाब करते, आप निश्चिंत रहो। फिर भी विचार कर रहे थे कि खाना खाया है, परंतु कुछ तो मल निकलना चाहिए। उनको लैट्रिन जाने का दबाव हुआ। सब शहर से बाहर चल पड़े। टट्टी के लिए एकान्त स्थान खोजकर बैठे तो गुदा से वायु निकली। पेट हल्का हो गया तथा वायु से सुगंध निकली जैसे केवड़े का पानी छिड़का हो। यह सब देखकर सबको सेवादारों की बात पर विश्वास हुआ। तब उनका भय समाप्त हुआ, परंतु फिर भी सबकी आँखों पर अज्ञान की पट्टी बँधी थी। परमेश्वर कबीर जी को परमेश्वर नहीं स्वीकारा।
पुराणों में भी प्रकरण आता है कि अयोध्या के राजा ऋषभ देव जी राज त्यागकर जंगलों में साधना करते थे। उनका भोजन स्वर्ग से आता था। उनके मल (पाखाने) से सुगंध निकलती थी। आसपास के क्षेत्र के व्यक्ति इसको देखकर आश्चर्यचकित होते थे। इसी तरह सतलोक का आहार करने से केवल सुगंध निकलती है, मल नहीं। स्वर्ग तो सतलोक की नकल है जो नकली है।

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कर्म भर्म भारी लगे, संसा सूल बंबूल।
डाली पानो डोलते, परसत नाहीं मूल।।

🍁 सरलार्थ :- जब तक सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तब तक संशय बबूल के सूल (काँटे) के समान चुभता रहता है। कोई भी भ्रमित कर देता है। अपनी क्रिया पर शंका हो जाती है। दूसरे की क्रिया स्वीकार करना मुश्किल होता है। जब तक सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होता तो जो क्रिया कर रहा है, वे कठिन भी लगती हैं, जैसे बैठकर या खड़ा होकर हठ योग द्वारा तप, हरिद्वार से पैदल चलकर कावड़ लाना आदि-आदि, ये कठिन भी लगती हैं तथा भ्रम, अविश्वास भी रहता है। फिर साधक सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान के अभाव से संसार रूपी वृक्ष के मूल को न पूजकर डाली तथा पत्तों को पूजता डोल रहा है।

🍁 श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में तथा श्लोक 16-17 में बताया है कि यह संसार पीपल के वृक्ष के तुल्य जानो जिसकी मूल (जड़ें) तो ऊपर को हैं, वह तो पूर्ण परमात्मा मानो जो सर्व का सृजन करने वाला तथा धारण-पोषण करने वाला है। उसको गीता अध्याय 8 श्लोक 3,8,9,10 में परम अक्षर ब्रह्म कहा है। इसी का विवरण गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में भी है। फिर गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में आगे कहा है कि जो संत उस संसार रूपी वृक्ष के सब अंगों का ज्ञान करा देता है, वह वेदवित अर्थात् वेद के तात्पर्य को जानने वाला तत्वदर्शी संत है। इस वृक्ष की ऊपर को जड़ नीचे को शाखा हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 2-3 में बताया है कि इस संसार रूपी वृक्ष की तीनों गुण (रजगुण श्री ब्रह्मा जी, सतगुण श्री विष्णु जी तथा तमगुण श्री शिव जी) रूपी शाखाएं हैं जो ऊपर स्वर्ग लोक में तथा नीचे पाताल लोक तक फैली हैं। तीसरे पृथ्वी लोक पर यह गीता ज्ञान बोला जा रहा था क्योंकि श्री ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश जी की सत्ता एक ब्रह्माण्ड में बने तीनों लोकों पर ही है। इसलिए कहा है कि इनकी सत्ता पृथ्वी के अतिरिक्त ऊपर (स्वर्ग लोक में) तथा नीचे (पाताल लोक में) फैली है। ये ही तीनों देवता (तीनों गुण रूपी शाखा) प्रत्येक प्राणी को कर्मों के अनुसार संसार चक्र में बाँधने वाले मुख्य हैं।

🍁 गीता अध्याय 15 श्लोक 3 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि "इस संसार का वृक्ष जैसा स्वरूप है, पूर्ण रूप से मैं यहाँ विचार काल में अर्थात् मेरे द्वारा बताए जा रहे गीता ज्ञान में मैं तुझे नहीं बता पाऊंगा क्योंकि जैसी वास्तविक इस संसार रूपी वृक्ष की संरचना है, वैसी नहीं पाई जाती।

🍁 भावार्थ है कि गीता ज्ञान दाता को भी सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान नहीं है। उसके लिए गीता अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 में स्पष्ट किया है कि सम्पूर्ण यज्ञों अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञान स्वयं सच्चिदानन्द घन ब्रह्म (ब्रह्मणः) अपने मुख कमल से (मुखे) बोलकर कही वाणी में विस्तारपूर्वक कहता है, वह तत्वज्ञान है। (गीता अध्याय 4 श्लोक 32) फिर गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा है कि वह तत्वज्ञान तत्वदर्शी संतों से समझ, उनको दण्डवत करने से नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भली-भांति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तेरे को तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। इससे सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता को पूर्ण अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है। यदि होता तो एक अध्याय और बोल देता और कहता तत्वज्ञान उस अध्याय में पढ़ लेना।

🍁 गीता अध्याय 15 श्लोक 3 में गीता ज्ञान दाता ने स्पष्ट किया है कि अर्जुन! मैं तेरे को इस संसार रूपी वृक्ष के सम्पूर्ण भाग नहीं बता पाऊँगा क्योंकि इसकी स्थिति का आदि-अंत को मुझे ज्ञान नहीं है। इस अति दृढ़ मूल वाले संसार रूपी वृक्ष को तत्वज्ञान रूपी शस्त्र द्वारा काटकर अर्थात् अच्छी तरह समझकर।

🍁 [विशेष :- संसार रूपी वृक्ष की मूल (जड़ें) तो ऊपर का भाग बताया है जो ऊपर के चार अमर लोक हैं (1.सत्यलोक 2.अलख लोक 3.अगम लोक 4.अकह-अनामी लोक) ये अति दृढ़ अर्थात् अविनाशी हैं । इसलिए अति दृढ़ मूल वाला कहा है।]

🍁 गीता अध्याय 15 श्लोक 4 :- गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि तत्वदर्शी संत से तत्वज्ञान समझकर अर्थात् नौ मन सूत सुलझने के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के बाद साधक लौटकर कभी संसार में नहीं आते। जिस परमेश्वर से संसार रूपी वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है अर्थात् जिसने संसार की रचना की है, केवल उसी मूल रूप परमेश्वर की भक्ति करो।

🍁 इस श्लोक में गीता ज्ञान दाता ने स्पष्ट कर दिया है कि मेरी भक्ति भी छोड़, उस मूल मालिक परमेश्वर की भक्ति करो जैसा कि गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में तीन पुरूष (प्रभु) बताए हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में कहा है कि इस संसार में दो पुरूष हैं :-

1. क्षर पुरूष (यह केवल 21 ब्रह्माण्डों का प्रभु है।)

2. अक्षर पुरूष (यह केवल 7 शंख ब्रह्माण्डों का प्रभु (पुरूष) है। ये दोनों तथा इनके अंतर्गत जितने जीव हैं, वे सब नाशवान हैं, आत्मा तो किसी की नहीं मरती। (गीता अध्याय 15 श्लोक 16)

3. परम अक्षर पुरूष (यह कुल का मालिक है, संसार रूपी वृक्ष का मूल रूप प्रभु है। यह असंख्य ब्रह्माण्डों का मालिक तथा सृजनहार है।) इस परम अक्षर ब्रह्म का ज्ञान गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में है। कहा है :- "उत्तम पुरूष अर्थात् पुरूषोत्तम तो उपरोक्त क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष से अन्य ही है जो परमात्मा कहा जाता है जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है, वह वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है।

[विशेष :- यहाँ पर तीन लोकों का जो वर्णन है, वे लोक इस प्रकार हैं: 👇🏽

1. क्षर पुरूष का 21 ब्रह्माण्डों का क्षेत्र है जो काल लोक कहलाता है।

2. अक्षर पुरूष का 7 शंख ब्रह्माण्डों का क्षेत्र जो अक्षर पुरूष लोक कहलाता है।

3. परम अक्षर पुरूष के ऊपर के चार लोकों वाला क्षेत्र जो अमर लोक कहलाता है।]

🍁 इसलिए गीता अध्याय 15 के श्लोक 17 में कहा है कि परम अक्षर पुरूष तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है। अब संत गरीबदास जी की अमर वाणी नं.15 का शेष सरलार्थ करते हैं:

🍁 संत गरीबदास जी ने भी गीता वाले ज्ञान को दृढ़ किया है कि आप जी डालियों { शाखा रूपी तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी) की पूजा करते डोलते अर्थात् फिरते हो, आप मूल को नहीं पूज रहे। जिस कारण से मोक्ष फल से वंचित हैं।}(15)


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Tuesday, 2 June 2020





‘‘तीनों गुण रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी हैं। ब्रह्म (काल) तथा प्रकृति (दुर्गा) से उत्पन्न हुए हैं तथा तीनों नाशवान हैं‘‘

प्रमाण:- गीताप्रैस गोरखपुर से प्रकाशित श्री शिव महापुराण जिसके सम्पादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार पृष्ठ सं. 110 अध्याय 9 रूद्र संहिता ‘‘इस प्रकार ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव तीनों देवताओं में गुण हैं, परन्तु शिव (ब्रह्म-काल) गुणातीत कहा गया है।

दूसरा प्रमाण:- गीताप्रैस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद् देवीभागवत पुराण जिसके सम्पादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पौद्दार चिमन लाल गोस्वामी, तीसरा स्कंद, अध्याय 5 पृष्ठ 123:-



भगवान विष्णु ने दुर्गा की स्तुति की: कहा कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा तथा शंकर तुम्हारी कृपा से विद्यमान हैं। हमारा तो आविर्भाव (जन्म) तथा तिरोभाव (मृत्यु) होती है। हम नित्य (अविनाशी) नहीं हैं। तुम ही नित्य हो, जगत् जननी हो, प्रकृति और सनातनी देवी हो। भगवान शंकर ने कहा: यदि भगवान ब्रह्मा तथा भगवान विष्णु तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाला मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी संतान नहीं हुआ अर्थात् मुझे भी उत्पन्न करने वाली तुम ही हों। इस संसार की सृष्टी-स्थिति-संहार में तुम्हारे गुण सदा सर्वदा हैं। इन्हीं तीनों गुणों से उत्पन्न हम, ब्रह्मा-विष्णु तथा शंकर नियमानुसार कार्य में तत्त्पर रहते हैं।
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Monday, 1 June 2020


आज हम जानेंगे कि वास्तव में पूर्ण परमात्मा कौन है ?

आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले कोई भी धर्म या अन्य सम्प्रदाय नहीं था। न हिन्दु, न मुसलिम, न सिक्ख और न ईसाई थे। केवल मानव धर्म था। सभी का एक ही मानव धर्म था और है। लेकिन जैसे-2 कलयुग का प्रभाव बढ़ता गया वैसे-2  हमारे में मत-भेद होता गया। कारण सिर्फ यही रहा कि धार्मिक कुल गुरुओं द्वारा शास्त्रों में लिखी हुई सच्चाई को दबा दिया गया। कारण चाहे स्वार्थ हो या ऊपरी दिखावा। जिसके परिणाम स्वरूप आज एक मानव धर्म के चार धर्म और अन्य अनेक सम्प्रदाएँ बन चुकी हैं। जिसके कारण आपस में मतभेद होना स्वाभाविक ही है।

सभी का प्रभु/भगवान/राम/अल्लाह/रब/गोड/खुदा/परमेश्वर एक ही है। ये भाषा भिन्न पर्यायवाची शब्द हैं। सभी मानते हैं कि सबका मालिक एक है लेकिन फिर भी ये अलग-2  धर्म सम्प्रदाएँ क्यो?

यह बात बिल्कुल ठीक है कि सबका मालिक/रब/खुदा/अल्लाह/गोड/ राम/परमेश्वर एक ही है जिसका वास्तविक नाम कबीर है और वह अपने सतलोक/सतधाम/सच्चखण्ड में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है।लेकिन,
अब हिन्दु तो कहते हैं कि हमारा राम बड़ा है,
मुसलिम कहते हैं कि हमारा अल्लाह बड़ा है,
ईसाई कहते हैं कि हमारा ईसामसीह बड़ा
और सिक्ख कहते हैं कि हमारे गुरु नानक साहेब जी बड़े हैं।

ऐसे कहते हैं जैसे चार नादान बच्चे कहते हैं कि यह मेरा पापा, दूसरा कहेगा यह मेरा पापा है तेरा नहीं है, तीसरा कहेगा यह तो मेरा पिता जी है जो सबसे बड़ा है और फिर चौथा कहेगा कि अरे नहीं नादानों! यह मेरा डैडी है, तुम्हारा नहीं है। जबकि उन चारों का पिता वही एक ही है। इन्हीं नादान बच्चों की तरह आज हमारा मानव समाज लड़ रहा है।


‘‘कोई कहै हमारा राम बड़ा है, कोई कहे खुदाई रे।
कोई कहे हमारा ईसामसीह बड़ा, ये बाटा रहे लगाई रे।।‘‘

जबकि हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों में उस एक प्रभु/मालिक/रब/ खुदा/अल्लाह/राम/साहेब/गोड/परमेश्वर की प्रत्यक्ष नाम लिख कर महिमा गाई है कि वह एक मालिक/प्रभु कबीर साहेब है जो सतलोक में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है। वेद, गीता, कुरान और गुरु ग्रन्थ साहेब ये सब लगभग मिलते जुलते ही हैं।

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