Sunday, 31 May 2020

(Note:- नीचे दी गई समस्त जानकारी बिल्कुल प्रमाणित है और सत्य है आप स्वयं निर्णय कर सकते हैं)

 कविर्देव ने यही कहा था कि मैं स्वयं पूर्ण परमात्मा हूँ। अपने स्वस्थ ज्ञान का संदेशवाहक रूप में मैं स्वयं ही आया हूँ, मुझे पहचानों। 
परन्तु ऐसे ही आचार्यों ने पहले भी परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान को जनता तक नहीं जाने दिया। कहा करते थे कि कबीर तो अशिक्षित है, यह संस्कृत तो जानता ही नहीं, हम शिक्षित हैं। इस बात पर पहले तो भक्तजन गुमराह हो गए थे, परन्तु अब सर्व समाज शिक्षित है, इन मार्ग भ्रष्ट आचार्यों की दाल नहीं गल रही, न ही गलेगी।

पवित्र वेदों में प्रमाण

कविर्देव अपने ज्ञान का दूत बनकर स्वयं ही आता है तथा अपना स्वस्थ ज्ञान (वास्तविक तत्वज्ञान) स्वयं ही कराता है।
स्वयं कविर्देव (कबीर परमेश्वर) जी ने अपनी अमृतवाणी में कहा है -
शब्द:अविगत से चल आए, कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया। (टेक) न मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक हो दिखलाया। काशी नगर जल कमल पर डेरा, वहाँ जुलाहे ने पाया।। मात-पिता मेरे कुछ नाहीं, ना मेरे घर दासी (पत्नी)। जुलहा का सुत आन कहाया, जगत करें मेरी हाँसी।। पाँच तत्व का धड़ नहीं मेरा, जानुं ज्ञान अपारा। सत्य स्वरूपी (वास्तविक) नाम साहेब (पूर्ण प्रभु) का सोई नाम हमारा।। अधर द्वीप (ऊपर सत्यलोक में) गगन गुफा में तहां निज वस्तु सारा। ज्योत स्वरूपी अलख निरंजन (ब्रह्म) भी धरता ध्यान हमारा।। हाड़ चाम लहु ना मेरे कोई जाने सत्यनाम उपासी। तारन तरन अभय पद दाता, मैं हूँ कबीर अविनाशी।।
उपरोक्त शब्द में कबीर परमेश्वर कह रहे हैं कि न तो मेरी कोई पत्नी है, न ही मेरा पाँच तत्व (हाड-चाम, लहू अर्थात् नाडि़यों के जोड़-जुगाड़ वाली काया) का शरीर है, मैं स्वयंभू हूँ तथा काशी के लहरतारा नामक तालाब के जल में कमल के फूल पर स्वयं प्रकट होकर बालक रूप बनाया था। वहाँ से मुझे नीरू नामक जुलाहा उठा कर ले गया था। जो वास्तविक नाम परमेश्वर का अर्थात् मेरा है (वेदों में कविर्देव, गुरु ग्रन्थ साहेब में हक्का कबीर तथा कुरान शरीफ में अल्लाह कबीरन्) वही नाम मेरा है, मैं ऊपर ऋतधाम में रहता हूँ तथा आप का भगवान ज्योति निरंजन (ब्रह्म) भी मेरी पूजा करता है। इसी का प्रमाण सत्यार्थ प्रकाश सातवें समुल्लास (पृ. 152-153, दीनानगर पंजाब से प्रकाशित) में भी है। स्वामी दयानन्द जी ने यजुर्वेद अध्याय 13 मन्त्र 4 तथा ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 49 मन्त्र 1 का अनुवाद किया है। जिसमें वेदों को बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है (5 = ऋग्वेद मं. 10 सु. 49 मं. 1 तथा 6 = यजुर्वेद अध्याय 13 मं. 4 में) - हे मनुष्यों जो सृष्टी के पूर्व सर्व की उत्पति करता तथा सर्व का स्वामी था, है, आगे भी रहेगा वही सर्व सृष्टी को बनाकर धारण कर रहा है। उस सुख स्वरूप परमात्मा की भक्ति जैसे हम (ब्रह्म तथा अन्य देव भी उसी की साधना) करते हैं वैसे ही तुम लोग भी करो।
प्रमाण - 1. पवित्र यजुर्वेद अध्याय 29 मंत्र 25 -
समिद्धोऽअद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः।
आ च वह मित्रामहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः।।25।।
समिद्धः-अद्य-मनुषः-दुरोणे-देवः-देवान्-यज्-असि- जात-वेदः-आ- च-वह- मित्रामहः-चिकित्वान्-त्वम्-दूतः- कविर्-असि-प्रचेताः।
अनुवाद - (अद्य) आज अर्थात् वर्तमान में (दुरोणे) शरीर रूप महल में दुराचार पूर्वक (मनुषः) झूठी पूजा में लीन मननशील व्यक्तियों को (समिद्धः) लगाई हुई आग अर्थात् शास्त्रा विधि रहित वर्तमान पूजा जो हानिकारक होती है, अग्नि जला कर भस्म कर देती है ऐसे साधक का जीवन शास्त्राविरूद्ध साधना नष्ट कर देती है। उसके स्थान पर (देवान्) देवताओं के (देवः) देवता (जातवेदः) पूर्ण परमात्मा सतपुरुष की वास्तविक (यज्) पूजा (असि) है। (आ) दयालु , (मित्रामहः) जीव का वास्तविक साथी पूर्ण परमात्मा के (चिकित्वान्) स्वस्थ ज्ञान अर्थात् यथार्थ भक्ति को (दूतः) संदेशवाहक रूप में (वह) लेकर आने वाला (च) तथा (प्रचेताः) बोध कराने वाला (त्वम्) आप (कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर) कबीर (असि) है।
भावार्थ:- जिस समय भक्त समाज को शास्त्राविधी त्यागकर मनमाना आचरण (पूजा) कराया जा रहा होता है। उस समय कविर्देव (कबीर परमेश्वर) तत्व ज्ञान को प्रकट करता है।
प्रमाण 2. पवित्र सामवेद संख्या 1400 में
संख्या न. 359 सामवेद अध्याय न. 4 के खण्ड न. 25 का श्लोक न. 8 -
पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत। इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः ।।4।।
पुराम्-भिन्दुः-युवा-कविर्-अमित-औजा-अजायत-इन्द्रः-विश्वस्य-कर्मणः-धर्ता-वज्री- पुरूष्टुतः।
शब्दार्थ:- (युवा) पूर्ण समर्थ (कविर्) कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर (अमितऔजा) विशाल शक्ति युक्त अर्थात् सर्व शक्तिमान है (अजायत) तेजपुंज का शरीर मायावयी बनाकर (धर्ता) प्रकट होकर अर्थात् अवतार धारकर (वज्री) अपने सत्यशब्द व सत्यनाम रूपी शस्त्रा से (पुराम्) काल-ब्रह्म के पाप रूपी बन्धन रूपी कीले को (भिन्दुः) तोड़ने वाला, टुकड़े-टुकड़े करने वाला (इन्द्रः) सर्व सुखदायक परमेश्वर (विश्वस्य) सर्व जगत के सर्व प्राणियों को (कर्मणः) मनसा वाचा कर्मणा अर्थात् पूर्ण निष्ठा के साथ अनन्य मन से धार्मिक कर्मो द्वारा सत्य भक्ति से (पुरूष्टुतः) स्तुति उपासना करने योग्य है।
{जैसे बच्चा तथा वृद्ध सर्व कार्य करने में समर्थ नहीं होते जवान व्यक्ति सर्व कार्य करने की क्षमता रखता है। ऐसे ही परब्रह्म-ब्रह्म व त्रिलोकिय ब्रह्मा-विष्णु-शिव तथा अन्य देवी-देवताओं को बच्चे तथा वृद्ध समझो इसलिए कबीर परमेश्वर को युवा की उपमा वेद में दी है}
भावार्थ:- जो कविर्देव (कबीर परमेश्वर) तत्वज्ञान लेकर संसार में आता है। वह सर्वशक्तिमान है तथा काल (ब्रह्म) के कर्म रूपी किले को तोड़ने वाला है वह सर्व सुखदाता है तथा सर्व के पुजा करने योग्य है।
संख्या नं. 1400 सामवेद उतार्चिक अध्याय नं. 12 खण्ड नं. 3 श्लोक नं. 5
भद्रा वस्त्र समन्या3वसानो महान् कविर्निवचनानि शंसन्।
आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ।।5।।
भद्रा वस्त्र समन्या वसअनः महान् कविर् निवचनानि शंसन् आवच्यस्व चम्वोः पूयमानः विचक्षणः जागृविः देव वीतौ
अनुवाद:- (विचक्षणः) चतुर व्यक्तियों ने (आवच्यस्व) अपने वचनों द्वारा पूर्णब्रह्म की पूजा को न बताकर आन उपासना का मार्ग दर्शन करके अमृत के स्थान पर (पूयमानः) आन उपासना {जैसे भूत-प्रेत पूजा, पित्रा पूजा, तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शिव शंकर) तथा ब्रह्म-काल तक की पूजा} रूपी मवाद को (चम्वोः) आदर के साथ आचमन करा रहे गलत ज्ञान को (भद्रा) परमसुखदायक (महान् कविर्) पूर्ण परमात्मा कबीर (वस्त्र) सशरीर साधारण वेशभूषा में ‘‘अर्थात् वस्त्र का अर्थ है वेशभूषा, संत भाषा में इसे चोला भी कहते हैं, चोला का अर्थ है शरीर। यदि किसी संत का देहान्त हो जाता है तो कहते हैं कि चोला छोड़ गए‘‘ (समन्या) अपने सत्यलोक वाले शरीर के सदृश अन्य शरीर तेजपुंज का धारकर (वसानः) आम व्यक्ति की तरह जीवन जी कर कुछ दिन संसार में रह कर (निवचनानि) अपनी शब्दावली आदि के माध्यम से सत्यज्ञान (शंसन्) वर्णन करके (देव) पूर्ण परमात्मा के (वीतौ) छिपे हुए सर्गुण-निर्गुण ज्ञान को (जागृविः) जाग्रत करते हैं।
भावार्थ:- शास्त्राविधि विरूद्ध साधना रूपी मवाद अर्थात् घातक साधना पर आधारित भक्त समाज को कविर्देव (कबीर परमेश्वर) तत्वज्ञान समझाने के लिए यहाँ संसार में प्रकट होता है। उस समय अपने तेजोमय शरीर पर अन्य शरीर रूपी वस्त्र (हलके तेज का) पहन कर आता है। (क्योंकि परमेश्वर के वास्तविक तेजोमय शरीर को चर्म दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।) कुछ दिन आम व्यक्ति जैसा जीवन जीकर लीला करता है तथा परमेश्वर को (अपने को) पाने वाले ज्ञान को उजागर करता है।
ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17
शिशुं जज्ञानं हर्यतं मृजन्ति शुम्भन्ति वहिन मरूतो गणेन।
कविर्गीभिः काव्येना कविः सन्त्सोमः पवित्रमत्येति रेभन्।।17।।
शिशुम् जज्ञानम् हर्य तम् मृजन्ति शुम्भन्ति वहिन मरूतः गणेन।
कविर्गीर्भि काव्येना कविर् सन्त् सोमः पवित्रम् अत्येति रेभन्।।
अनुवाद - पूर्ण परमात्मा (हर्य शिशुम्) विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में (जज्ञानम्) जान बूझ कर प्रकट होता है तथा अपने तत्वज्ञान को (तम्) उस समय (मृजन्ति) निर्मलता के साथ (शुम्भन्ति) उच्चारण करता है। (वहि) प्रभु प्राप्ति की लगी विरह अग्नि वाले (मरुतः) भक्त (गणेन) समूह के लिए (काव्येना) कविताओं द्वारा कवित्व से (पवित्रम् अत्येति) अत्यधिक वाणी निर्मलता के साथ (कविर गीर्भि) कविर वाणी अर्थात् कबीर वाणी द्वारा (रेभन्) ऊंचे स्वर से सम्बोधन करके बोलता है, (कविर् सन्त् सोमः) वह अमर पुरुष अर्थात् सतपुरुष ही संत अर्थात् ऋषि रूप में स्वयं कविर्देव ही होता है। परन्तु उस परमात्मा को न पहचान कर कवि कहने लग जाते हैं। परन्तु वह पूर्ण परमात्मा ही होता है। उसका वास्तविक नाम कविर्देव है।
भावार्थ - ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सुक्त नं. 96 मन्त्र 16 में कहा है कि आओ पूर्ण परमात्मा के वास्तविक नाम को जाने इस मन्त्र 17 में उस परमात्मा का नाम व परिपूर्ण परिचय दिया है। वेद बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में प्रकट होकर कविर्देव अपने वास्तविक ज्ञानको अपनी कबीर बाणी के द्वारा निर्मल ज्ञान अपने हंसात्माओं अर्थात् पुण्यात्मा अनुयाइयों को कविताओं, लोकोक्तियों के द्वारा सम्बोधन करके अर्थात् उच्चारण करके वर्णन करता है। इस तत्वज्ञान के अभाव से उस समय प्रकट परमात्मा को न पहचान कर केवल ऋषि व संत या कवि मान लेते हैं वह परमात्मा स्वयं भी कहता है कि मैं पूर्ण ब्रह्म हूँ परन्तु लोक वेद के आधार से परमात्मा को निराकार माने हुए प्रजाजन नहीं पहचानते जैसे गरीबदास जी महाराज ने काशी में प्रकट परमात्मा को पहचान कर उनकी महिमा कही तथा उस परमेश्वर द्वारा अपनी महिमा बताई थी उसका यथावत् वर्णन अपनी वाणी में किया
गरीब, जाति हमारी जगत गुरू, परमेश्वर है पंथ। दासगरीब लिख पडे़ नाम निरंजन कंत।।
गरीब, हम ही अलख अल्लाह है, कुतूब गोस और पीर। गरीबदास खालिक धनी हमरा नाम कबीर।।
गरीब, ऐ स्वामी सृष्टा मैं, सृष्टी हमरे तीर, दास गरीब अधर बसू। अविगत सत कबीर।।
इतना स्पष्ट करने पर भी उसे कवि या संत, भक्त या जुलाहा कहते हैं। परन्तु वह पूर्ण परमात्मा ही होता है। उसका वास्तविक नाम कविर्देव है। वह स्वयं सतपुरुष कबीर ही ऋषि या संत रूप में होता है। परन्तु तत्व ज्ञानहीन ऋषियों व संतों गुरूओं के अज्ञान सिद्धांत के आधार पर आधारित प्रजा उस समय अतिथि रूप में प्रकट परमात्मा को नहीं पहचानते क्योंकि उन अज्ञानी ऋषियों, संतों व गुरूओं में परमात्मा को निराकार बताया होता है।
ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18
ऋषिमना य ऋषिकृत्स्वर्षाः सहकणीथः पदवीः कवीनाम्।
तृतीयं धाम महिषः सिषासन्त्सोमो विराजमनु राजति ष्टुप्।।18।।
ऋषिमना य ऋषिकृत् स्वर्षाः सहòाणीथः पदवीः कवीनाम्। तृतीयम् धाम महिषः सिषा सन्त्  सोमः विराजमानु राजति स्टुप्।।
अनुवाद - वेद बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि (य) जो पूर्ण परमात्मा विलक्षण बच्चे के रूप में आकर (कवीनाम्) प्रसिद्ध कवियों की (पदवीः) उपाधि प्राप्त करके अर्थात् एक संत या ऋषि की भूमिका करता है उस (ऋषिकृत्) संत रूप में प्रकट हुए प्रभु द्वारा रची (सहस्‍त्राणीथ:) हजारों वाणी (ऋषिमना) संत स्वभाव वाले व्यक्तियों अर्थात् भक्तों के लिए (स्वर्षाः) स्वर्ग तुल्य आनन्द दायक होती हैं। (सोम) वह अमर पुरुष अर्थात् सतपुरुष (तृतीया) तीसरे (धाम) मुक्ति लोक अर्थात् सत्यलोक की (महिषः) सुदृढ़ पृथ्वी को (सिषा) स्थापित करके (अनु) पश्चात् (सन्त्) मानव सदृश संत रूप में होता हुआ (स्टुप) गुबंद अर्थात् गुम्बज में उच्चे टिले रूपी सिंहासन पर (विराजमनु राजति) उज्जवल स्थूल आकार में अर्थात् मानव सदृश तेजोमय शरीर में विराजमान है।
भावार्थ - मंत्र 17 में कहा है कि कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, संत व कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर् ही है। उसके द्वारा रची अमृतवाणी कबीर वाणी (कविर्वाणी) कही जाती है, जो भक्तों के लिए स्वर्ग तुल्य सुखदाई होती है। वही परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सत्यलोक की स्थापना करके एक गुबंद अर्थात् गुम्बज में सिंहासन पर तेजोमय मानव सदृश शरीर में आकार में विराजमान है।
इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। जैसे एक ब्रह्म का लोक जो इक्कीस ब्रह्मण्ड का क्षेत्र है, दूसरा परब्रह्म का लोक जो सात संख ब्रह्मण्ड का क्षेत्र है, तीसरा परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् पूर्ण ब्रह्म का सतलोक है क्योंकि पूर्ण परमात्मा ने सत्यलोक में सत्यपुरूष रूप में विराजमान होकर नीचे के लोकों की रचना की है। इसलिए नीचे के लोकों की गणना की गई है।
यही आँखों देखा प्रमाण सन्त गरीब दास जी ने बताया है अर्स कुर्स पर सफेद गुम्बज है जहाँ सतगुरु का डेरा। भावार्थ यह है कि ऊपर आसमान के ऊपरी छोर पर कबीर परमेश्वर जी एक सफेद गुबंद (गुम्बज) में रहते हैं।
ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 19
चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत्।
अपामूर्भि सचमानाः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति।।19।।
चमूसत् श्येनः शकुनः विभृत्वा गोबिन्दुः द्रप्स आयुधानि बिभ्रत्।
अपामूर्भिः सचमानः समुद्रम् तुरीयम् धाम महिषः विवक्ति।।
अनुवाद - (चमूसत्) पवित्र (गोविन्दुः) कामधेनु रूपी सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाला पूर्ण परमात्मा कविर्देव (विभृत्वा) सर्व का पालन करने वाला है (श्येनः) सफेद रंग युक्त (शकुनः) शुभ लक्षण युक्त (चमूसत्) सर्वशक्तिमान है। (द्रप्सः) जैसे दूध से दही बनाने की विधी होती एैसे शास्त्रानुकूल साधना से दही रूपी पूर्ण मुक्ति दाता (आयुधानि) तत्व ज्ञान रूपी काल जाल विनाशक धनुष युक्त सारंगपाणी प्रभु है। (सचमानः) वास्तविक (बिभ्रत्) सर्व का पालन-पोषण करता है। (अपामूर्भिः) गहरे जल युक्त (समुद्रम्) सागर की तरह गहरा गम्भीर अर्थात् विशाल (तुरीयम्) चैथे (धाम) लोक अर्थात् अनामी लोक में (महिषः) उज्जवल सुदृढ़ पृथ्वी पर (विवक्ति) अलग स्थान पर भिन्न भी रहता है यह जानकारी कविर्देव स्वयं ही भिन्न-भिन्न करके विस्त्तार से देता है।
भावार्थ - मंत्र 18 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सतलोक में एक गुम्बज में रहता है। इस मंत्र 19 में कहा है कि अत्यधिक सफेद रंग वाला पूर्ण प्रभु जो कामधेनु की तरह सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाला है, वही वास्तव में सर्व का पालन कर्ता है। वही कविर्देव जो मृतलोक में शिशु रूप धारकर आता है वही जैसे दूध से दही बनाने की विधी होती है एैसे पूर्ण मोक्ष प्राप्त करने की शास्त्राविधि अनुसार साधना बता कर पूर्ण मोक्ष रूपी दही प्रदान करने वाला है तत्वज्ञान रूपी शास्त्र अर्थात् धनुष युक्त होने से सारंगपाणी है तथा जैसे समुद्र सर्व जल का òोत है वैसे ही पूर्ण परमात्मा से सर्व की उत्पत्ति हुई है।  गीता अध्याय 15 श्लोक 3 में कहा है कि संसार रूपी वृक्ष को तत्त्वज्ञान रूपी शस्त्रा द्वारा काटकर अर्थात् तत्त्वज्ञान द्वारा संशय समाप्त करके उस के पश्चात् उस परम पद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए जहां जाने के पश्चात् साधक लौटकर कभी संसार में नहीं आते अर्थात् पूर्ण हो जाते हैं। जिस परमेश्वर से सर्व संसार रूपी वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है। वह पूर्ण प्रभु चैथे धाम अर्थात् अनामी लोक में रहता हैं, जैसे प्रथम सतलोक दूसरा अलख लोक, तीसरा अगम लोक, चौथा अनामी लोक है। इसलिए इस मंत्र 19 में स्पष्ट किया है कि कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ही अनामी पुरुष रूप में चौथे धाम अर्थात् अनामी लोक में भी अन्य तेजोमय रूप धारण करके रहता है।
ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 20
मर्यो न शुभ्रस्तन्वं मृजानोऽत्यो न सृत्वा सनये धनानाम्।
वृषेव यूथा परि कोशमर्षनकनिक्रदच्चम्बो3रा विवेश।।20।।
मर्यः न शुभ्रस्तन्वम् मृजानः अत्यः न सृत्वा सनये धनानाम्
वृषेव यूथा परिकोशम् अर्षन् कनिक्रदत् चम्वोः इरा विवेश
अनुवाद - पूर्ण परमात्मा कविर्देव जो चैथे धाम अर्थात् अनामी लोक में तथा तीसरे धाम अर्थात् सत्यलोक में रहता है वही परमात्मा (न मर्यः) मनुष्य जैसा है परन्तु नाश रहित अर्थात् अमर (मृजनः) निर्मल मुखमण्डल युक्त आकार में (अत्यः) बहुत (शुभ्रस्तन्वम्) विशाल श्वेत शरीर धारण करता हुआ ऊपर के लोकों में विद्यमान है तथा वहाँ से (सृत्वा) गति करके अर्थात् चलकर जिसका किसी को पता नहीं चलता वही समरूप परमात्मा (इरा) पृथ्वी पर (विवेश) अन्य वेशभूषा अर्थात् भिन्न रूप (चम्वोः) धारण करके आता है। सतलोक तथा पृथ्वी लोक पर लीला करता है (यथा) बहुत बड़े समुह को वास्तविक (सनये) सनातन पूजा की (वृषेव) वर्षा करके (न धनानाम्) उन रामनाम की कमाई के निर्धनों को (कनिक्रदत्) मंद स्वर से अर्थात् स्वांस-उस्वांस से मन ही मन में उचारण करके पूजा करवाता है, जिससे असंख्य अनुयाइयों का पूरा संघ (परि कोशम्) पूर्व वाले सुख सागर रूप अमृत खजाने अर्थात् सत्यलोक को (अर्षन्) पूजा करके प्राप्त करता है।
भावार्थ - पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ऊपर तीसरे धाम अर्थात् सत्यलोक में रहता है तथा वही परमेश्वर अन्य मनुष्य रूप धारण करके चैथे धाम अर्थात् अनामी लोक में रहता है। वही परमात्मा वैसा ही मनुष्य वाला समरूप सुन्दर मुखमण्डल युक्त श्वेत शरीर युक्त आकार में यहाँ पृथ्वी लोक पर भी आता है तथा अपनी वास्तविक पूजा विधि का ज्ञान करवा कर बहुत सारे समूह को अर्थात् पूरे संघ को सत्यभक्ति के धनी बनाता है, असंख्य अनुयाइयों का पूरा संघ सत्य भक्ति की कमाई से पूर्व वाले सुखमय लोक पूर्ण मुक्ति के खजाने को अर्थात् सत्यलोक को साधना करके प्राप्त करता है।
अथर्ववेद काण्ड नं. 4 अनुवाक न. 1, मन्त्र नं. 7 (संत रामपाल दास द्वारा भाषा भाष्य):-     
योऽथर्वाणं पित्तरं देवबन्धुं बृहस्पतिं नमसाव च गच्छात्।
त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत् स्वधावान्।।7।।
यः-अथर्वाणम्-पित्तरम्-देवबन्धुम्-बृहस्पतिम्-नमसा-अव-च-गच्छात्-त्वम्-
विश्वेषाम्-जनिता-यथा-सः-कविर्देवः-न-दभायत्-स्वधावान्
अनुवाद:- (यः) जो (अथर्वाणम्) अचल अर्थात् अविनाशी (पित्तरम्) जगत पिता (देवबन्धुम्) भक्तों का वास्तविक साथी अर्थात् आत्मा का आधार (बृहस्पतिम्) सबसे बड़ा स्वामी ज्ञान दाता जगतगुरु (च) तथा (नमसा) विनम्र पुजारी अर्थात् विधिवत् साधक को (अव) सुरक्षा के साथ (गच्छात्) जो सतलोक जा चुके हैं उनको सतलोक ले जाने वाला (विश्वेषाम्) सर्व ब्रह्मण्डों को (जनिता) रचने वाला (न दभायत्) काल की तरह धोखा न देने वाले (स्वधावान्) स्वभाव अर्थात् गुणों वाला (यथा) ज्यों का त्यों अर्थात् वैसा ही (सः) वह (त्वम्) आप (कविर्देवः कविर्/देवः) कबीर परमेश्वर अर्थात् कविर्देव है।
भावार्थ:- जिस परमेश्वर के विषय में कहा जाता है - त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धु च सखा त्वमेव, त्वमेव विद्या च द्रविणम्, त्वमेव सर्वम् मम् देव देव।। वह जो अविनाशी सर्व का माता पिता तथा भाई व सखा व जगत गुरु रूप में सर्व को सत्य भक्ति प्रदान करके सतलोक ले जाने वाला, काल की तरह धोखा न देने वाला, सर्व ब्रह्मण्डों की रचना करने वाला कविर्देव (कबीर परमेश्वर) है।
               धन्यवाद ✌🏻✌🏻✌🏻
                         मिलते हैं अगले ब्लॉग में 🙏🙏🙏🙏
Theism



🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

किसी ने कभी भगवान को देखा है
हम मृत्यु के बाद कहाँ जाते हैं?
ईश्वर का अस्तित्व क्या है?
 हम कहां से आए हैं?
??
क्या ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है?
??

🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ये कुछ सवाल हैं जो निश्चित रूप से हमारे दिमाग से किसी न किसी स्तर पर फांसाया है कि क्या हम खुद को आस्तिक कहें या नास्तिक हैं। हालाँकि हम आज तक इन सवालों का जवाब नहीं दे पाए हैं।


सभी धार्मिक शिक्षक, संत भगवान के बारे में किए गए दावों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत देने में विफल रहे हैं। विज्ञान की उन्नति के कारण, इनमें से कुछ दावे तर्क की कमी से और अधिक प्रश्न उठाते हैं। इसके अलावा संतों और नेताओं द्वारा किए गए दावों में बड़े पैमाने पर अश्लीलता है जो एक ही धर्मशास्त्रीय पृष्ठभूमि से निकले हुए हैं, यह हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम आदि हैं जो निस्संदेह किसी व्यक्ति को धार्मिक ग्रंथों के अधिकार और अस्तित्व के लिए। के बारे में सवाल उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। भगवान, कभी-कभी उन्हें अज्ञेय मोड़ देता है।


                    "भगवान का अस्तित्व है, वह भी, सबूतों के साथ" 


"हिंदू धर्म"

ऋग्वेद मंडल 10 सुक्त 90 मंत्र 3 में लिखा है कि केवल एक ही भगवान है जिसका नाम कबीर (कवि) है।

वह शाश्वत है और मनुष्य जैसा दिखता है।

वह अपने अनन्त स्वर्ग अर्थात् सतलोक में रहता है। वे पूरे ब्रह्मांड के निर्माता हैं।



"इस्लाम"

 इसी तरह, सूरत-अल-फुरकान 25, आयत 52-59 में कुरान शरीफ और कुरान मजीद में, यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अल्लाह कबीर है। उसने पूरे ब्रह्मांड का निर्माण किया है।



"ईसाई धर्म"

Bibal, Genesis(36:9) में
यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि भगवान ने मनुष्यों को स्वयं की तरह बनाया है अर्थात् मानव रूप में। लेकिन इसके विपरीत, सभी ईसाई मानते हैं कि भगवान को नहीं देखा जा सकता है।
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Friday, 29 May 2020

पवित्र शास्त्र आध्यात्मिकता का संविधान है। वे हमें परमपिता परमात्मा अल्लाह खुदा रब के गुणों से अवगत कराते हैं और उनकी उपासना के सही तरीके का भी संकेत देते हैं। हालाँकि सभी पवित्र धर्म ग्रंथों  में सर्वशक्तिमान परमात्मा के अनेकों गुणों का वर्णन है,

परमात्मा का नाम कविर देव है। जिनको अन्य भाषाओ में कबीर साहिब, हक्का कबीर, सत कबीर, अल्लाह हु अकबर, कबीरन, कबीरा, खबीरा, नामो से जाना जाता है।

 * परमात्मा कबीर साहेब जी का प्रमाण वेदों में *⛳⛳⛳
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परमात्मा का नाम कबीर (कविर देव) है। - अथर्ववेद
पवित्र अथर्ववेद काण्ड नं. 4 अनुवाक नं. 1 मंत्र 7
योथर्वाणं पित्तरं देवबन्धुं बहस्पतिं नमसाव च गच्छात्।
त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत् स्वधावान्।।7।।

यः-अथर्वाणम्-पित्तरम्-देवबन्धुम्-बहस्पतिम्-नमसा-अव-च- गच्छात्-त्वम्- विश्वेषाम्-जनिता-यथा-सः-कविर्देवः-न-दभायत्-स्वधावान्

अनुवाद:- (यः) जो (अथर्वाणम्) अचल अर्थात् अविनाशी (पित्तरम्) जगत पिता (देव बन्धुम्) भक्तों का वास्तविक साथी अर्थात् आत्मा का आधार (बहस्पतिम्) जगतगुरु (च) तथा (नमसा) विनम्र पुजारी अर्थात् विधिवत् साधक को (अव) सुरक्षा के साथ (गच्छात्) सतलोक गए हुओं को सतलोक ले जाने वाला (विश्वेषाम्) सर्व ब्रह्मण्डों की (जनिता) रचना करने वाला जगदम्बा अर्थात् माता वाले गुणों से भी युक्त (न दभायत्) काल की तरह धोखा न देने वाले (स्वधावान्) स्वभाव अर्थात् गुणों वाला (यथा) ज्यों का त्यों अर्थात् वैसा ही (सः) वह (त्वम्) आप (कविर्देवः/ कविर्देवः) कविर्देव है अर्थात् भाषा भिन्न इसे कबीर परमेश्वर भी कहते हैं।

भावार्थ:- इस मंत्र में यह भी स्पष्ट कर दिया कि उस परमेश्वर का नाम कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर है, जिसने सर्व रचना की है। जो परमेश्वर अचल अर्थात् वास्तव में अविनाशी (गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में भी प्रमाण है) जगत् गुरु, आत्माधार, जो पूर्ण मुक्त होकर सतलोक गए हैं उनको सतलोक ले जाने वाला, सर्व ब्रह्मण्डों का रचनहार, काल (ब्रह्म) की तरह धोखा न देने वाला ज्यों का त्यों वह स्वयं कविर्देव अर्थात् कबीर प्रभु है। यही परमेश्वर सर्व ब्रह्मण्डों व प्राणियों को अपनी शब्द शक्ति से उत्पन्न करने के कारण (जनिता) माता भी कहलाता है तथा (पित्तरम्) पिता तथा (बन्धु) भाई भी वास्तव में यही है तथा (देव) परमेश्वर भी यही है। इसलिए इसी कविर्देव (कबीर परमेश्वर) की स्तुति किया करते हैं। त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धु च सखा त्वमेव, त्वमेव विद्या च द्रविणंम त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम् देव देव। इसी परमेश्वर की महिमा का पवित्र ऋग्वेद मण्डल नं. 1 सूक्त नं. 24 में विस्त त विवरण है।

*परमात्मा अल्लाह है कबीर का प्रमाण कुरान शरीफ में*
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प्रभु सशरीर है तथा उसका नाम कबीर है का प्रमाण
पवित्र कुरान शरीफ़ से सहाभार ज्यों का त्यों लेख”

सुरत-फुर्कानि नं. 25 आयत नं. 52 से 59
(इन आयत नं. 52 से 59 में विशेष प्रमाण है)
(कृप्या देखें पवित्र कुरान शरीफ से ज्यों का त्यों फोटो कापी लेख)
आयत 52:- फला तुतिअल् - काफिरन् व जहिद्हुम बिही जिहादन् कबीरा(कबीरन्)।52।

तो (ऐ पैग़म्बर !) तुम काफ़िरों का कहा न मानना और इस (र्क़ुआन की दलीलों) से उनका सामना बड़े जोर से करो। (52)

आयत नं. 52 का ऊपर अनुवाद किसी मुसलमान श्रद्धालु का किया हुआ है। तत्वज्ञान के अभाव से ग्रन्थ के वास्तविक अर्थ को प्रकट नहीं कर सका। वास्तव में इसका भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद जी का खुदा (प्रभु) कह रहा है कि हे पैगम्बर ! आप काफिरों (जो एक प्रभु की भक्ति त्याग कर अन्य देवी-देवताओं तथा मूर्ति आदि की पूजा करते हैं) का कहा मत मानना, क्योंकि वे लोग कबीर को पूर्ण परमात्मा नहीं मानते। आप मेरे द्वारा दिए इस र्कुआन के ज्ञान के आधार पर अटल रहना कि कबीर ही पूर्ण प्रभु है तथा कबीर अल्लाह के लिए संघर्ष करना(लड़ना नहीं) अर्थात् अडिग रहना।

आयत 58:- व तवक्कल् अलल् हरिूल्लजी ला यमूतु व सब्बिह् बिहम्दिही व कफा बिही बिजुनूबि अिबादिही खबीरा(कबीरा)।58।

और (ऐ पैग़म्बर ! ) उस जिन्दा (चैतन्य) पर भरोसा रखो जो कभी मरनेवाला नहीं और तारीफ़ के साथ उसकी पाकी बयान करते रहो और अपने बन्दों के गुनाहों से वह काफ़ी ख़बरदार है (58)

आयत संख्या 58 का ऊपर अनुवाद किसी मुसलमान भक्त का किया हुआ है जो वास्तविकता प्रकट करने में असमर्थ रहा है। वास्तव में इस आयत संख्या 58 का भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद जी जिसे अपना प्रभु मानते हैं वह कुरान ज्ञान दाता अल्लाह (प्रभु) किसी और पूर्ण प्रभु की तरफ संकेत कर रहा है कि ऐ पैगम्बर उस कबीर परमात्मा पर विश्वास रख जो तुझे जिंदा महात्मा के रूप में आकर मिला था। वह कभी मरने वाला नहीं है अर्थात् वास्तव में अविनाशी है। तारीफ के साथ उसकी पाकी(पवित्र महिमा) का गुणगान किए जा, वह कबीर अल्लाह(कविर्देव) पूजा के योग्य है तथा अपने उपासकों के सर्व पापों को विनाश करने वाला है।

आयत 59:- अल्ल्जी खलकस्समावाति वल्अर्ज व मा बैनहुमा फी सित्तति अय्यामिन् सुम्मस्तवा अलल्अर्शि अर्रह्मानु फस्अल् बिही खबीरन्(कबीरन्)।59।।

जिसने आसमानों और जमीन और जो कुछ उनके बीच में है (सबको) छः दिन में पैदा किया, फिर तख्त पर जा विराजा (वह अल्लाह बड़ा) रहमान है, तो उसकी खबर किसी बाखबर (इल्मवाले) से पूछ देखो। (59)

आयत संख्या 59 का ऊपर वाला अनुवाद किसी मुसलमान श्रद्धालु का किया हुआ है जो पवित्र शास्त्र र्कुआन शरीफ के वास्तविक भावार्थ से कोसों दूर है। इसका वास्तविक भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद को र्कुआन शरीफ बोलने वाला प्रभु (अल्लाह) कह रहा है कि वह कबीर प्रभु वही है जिसने जमीन तथा आसमान के बीच में जो भी विद्यमान है सर्व सृष्टी की रचना छः दिन में की तथा सातवें दिन ऊपर अपने सत्यलोक में सिंहासन पर विराजमान हो(बैठ) गया।

उस पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति कैसे होगी ? तथा वास्तविक ज्ञान तो किसी तत्वदर्शी संत(बाखबर) से पूछो, मैं (कुर्रान ज्ञान दाता) नहीं जानता।

दोनों पवित्र धर्मों (ईसाई तथा मुसलमान) के पवित्र शास्त्रों ने भी मिल-जुल कर प्रमाणित कर दिया कि सर्व सृष्टी रचनहार सर्व पाप विनाशक, सर्व शक्तिमान, अविनाशी परमात्मा मानव सदृश शरीर में आकार में है तथा सत्यलोक में रहता है। उसका नाम कबीर है, उसी को अल्लाहु अकबिरू भी कहते हैं।

सुरत फुर्कानि 25 आयत 52 से 59 में लिखा है कि कबीर परमात्मा ने छः दिन में सृष्टी की रचना की तथा सातवें दिन तख्त पर जा विराजा। जिस से परमात्मा साकार सिद्ध होता है।

"*भगवान कबीर जी का प्रमाण बाइबल में*"
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पवित्र बाइबिल अय्यूब 36: 5 के अनुसार पूर्ण परमात्मा
अय्यूब 36:5 (और्थोडौक्स यहूदी बाइबल - OJB)
परमेश्वर कबीर (शक्तिशाली) है, किन्तु वह लोगों से घृणा नहीं करता है।
परमेश्वर कबीर (सामर्थी) है और विवेकपूर्ण है।

बाइबल ने भी स्पष्ट किया है की प्रभु का नाम कबीर है।

अनुवाद कर्ताओ नें कबीर की जगह शक्तिशाली व सामर्थ वाला लिख दिया है। वास्तव में परमात्मा का नाम कबीर है। वेदो में, भगवद गीता में, श्री गुरु ग्रंथ साहिब में और कुरान शरीफ में भी परमात्मा का नाम कबीर है।

          धन्यवाद 🙏🙏🙏🙏🙏
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Wednesday, 20 May 2020

विवाह नाम में ही बहुत सारी खुशियां छुपी हुई है और एक सामान्य परिवार के लिए यह किसी त्योहार से कम नहीं लेकिन भारत में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव स्वरूप यह खुशियां धूमिल सी नजर आती है जिस प्रकार से शादी विवाह में कोरे दिखावे मात्र के लिए पैसे को पानी की तरह बहाया जाता है वह बहुत से परिवारों कि इन खुशियों को छिन्न-भिन्न कर देता है इस अंधाधुन होड़ में लोग बढ़-चढ़कर पैसा खर्च करते हैं अपनी झूठी शान के कारण लाखों-करोड़ों कर्ज में दब जाते हैं और अपने जीवन का नाश कर लेते हैं|
इस फिजूलखर्ची को खत्म करने और सामान्य सरल तरीके से शादी विवाह करने के लिए बहुत से एनजीओ और संस्थाएं इस क्षेत्र में कार्य कर रही है जो जगह-जगह मामूली से खर्च पर शादी मिलन समारोह और सम्मेलनों के द्वारा विवाह संपन्न करवा रहे हैं इसके लिए सभी वर्ग और समाज को आगे आकर एक मिसाल पेश करनी चाहिए जिससे लाखों-करोड़ों परिवार बचाए जा सके|


सभी संस्थाएं और समाज अपने स्तर तक प्रयासरत हैं साथ ही संत रामपाल जी महाराज की प्रेरणा से उनके अनुयाई दहेज रहित और  फूहड़ता मुक्त रमणिया अर्थात विवाह संपन्न करवा रहे हैं जिससे वे झूठे दिखावे के लिए इन खर्चों से मुक्त होकर इनसे बचे पैसे का सदुपयोग करते हैं और अपने जीवन का आनंद लेते हैं आप भी संत रामपाल जी महाराज से निशुल्क दीक्षा प्राप्त करके इस मुहिम का हिस्सा बन सकते हैं और अपना और अपने परिवार का कल्याण करवा सकते हैं उसके लिए रोजाना देखिए साधना चैनल रात 7:30 बजे जरूर
धन्यवाद मिलते हैं अगले ब्लॉग में
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Thursday, 14 May 2020

विवाह समाज की ऐसी पवित्र रस्म है जिसके द्वारा स्त्री और पुरुष को जीवन भर साथ रहने की मान्यता प्राप्त होती है,
इस परंपरा के द्वारा ही अनेकों रिश्ते नाते एक होते हैं लेकिन सदियों से चली आ रही इस परंपरा को लोग अनावश्यक खर्चो के द्वारा इतना बोझिल करते जा रहे हैं कि अब एक आम आदमी पुत्र अथवा पुत्री की शादी करने के लिए अपने संपूर्ण जीवन की जमा की गई पूंजी को इसमें झोंक देता है यह रस्म समाज के लिए श्राप की तरह बनती जा रही है आए दिन न जाने कितनी बहन बेटियों को दहेज न देने के लिए मारा जाता है यह समाज का क्रूर आईना है


वर्तमान में फैली इस भयावह स्थिति से बाहर निकलने के लिए भारत सरकार ने 1961 में दहेज विरोधी कानून पारित किया जिसके अनुसार इसमें दोषी पाए जाने पर 5 वर्ष की कैद और ₹15000 जुर्माना है
 साथ ही बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान भी चलाएं जा रहे हैं लेकिन जो स्थिति पहले थी वह अभी भी बनी हुई है या उससे भी ज्यादा भयावह हो चुकी है इस विवाह शादियों में होने वाले अनावश्यक खर्चा और दहेज को रोकने के लिए समाज के सभी वर्गों को आगे आना चाहिए|

वर्तमान में जब मैंने इसके सार्थक प्रयास करने वाली संस्थाओं का नाम खोजा समाचार पत्रों और वेबसाइट पर पाया कि एकमात्र संत रामपाल जी महाराज के अनुयाई ही इस मुहिम को अनवरत आगे बढ़ा रहे हैं और दहेज प्रथा को खत्म करने की सार्थक पहल कर रहे हैं संत जी के अनुयाई लाखों की संख्या में है और यह प्रण लेते हैं कि वे बिना दहेज के रमणी (शादी) करेंगे, आइए आप और हम इस मुहिम का हिस्सा बनकर समाज में फैली इस कुरीति को समाप्त करें|
संत रामपाल जी महाराज जैसे संतो के द्वारा ऐसे सार्थक प्रयास देखते हैं तो गौरवान्वित महसूस करते हैं कि ऐसे भी लोग जिंदा है जो समाज को एक नई दिशा प्रदान करना चाहते हैं धन्यवाद

मिलते हैं अगले ब्लॉग में🙏🙏

Wednesday, 13 May 2020

मानव पिछले कुछ दशकों से विकास के साथ-साथ अकूत संपत्ति की अंधाधुंध दौड़ में पागल सा हो गया है जिस कारण वह है सामाजिक लगाव और पारिवारिक संबंधों से बहुत दूर जा चुका है और अत्यधिक तनाव में ग्रसित होने लगा है  मस्तिष्क के करोड़ टन से भी अधिक वजनी तनाव और अवसाद से छुटकारा पाने के लिए या तो वह है किसी चिकित्सक की सहायता लेता है अन्यथा 80% मामलों में भयानक नशे का सहारा लेते हैं जिस कारण आज पूरे विश्व में सबसे अधिक लोग नशे का शिकार है और नशे की इस बुरी लत ने राक्षस बना दिया है जिसके कहीं उदाहरण हम दिन प्रतिदिन समाचार पत्रों में देखते हैं
नशे रूपी राक्षस का सर्वनाश करने के लिए देश-विदेश में बहुत सी सरकारी संस्थाएं और प्राइवेट संस्थाएं कार्यरत है जो अथक प्रयास कर रही है कि इस राक्षस रूपी नशे को समाप्त किया जाए और मानव समाज को एक नई दिशा प्रदान की जाए
नशे को समाप्त करने के विरुद्ध इस महा अभियान में देश की छोटी-छोटी संस्थाएं और एनजीओ घर घर जाकर और नुक्कड़ नाटक द्वारा लोगों को जागरूक कर रहे हैं


सरकारी तथा बहुत सी संस्थाएं दशकों से प्रयासरत है कि नशा मुक्त समाज की स्थापना हो लेकिन इनके द्वारा किए गए प्रयास ज्यादा कारगर नहीं हो पा रहे हैं हमें वैज्ञानिक तथा मेडिकल साइंस के अलावा अध्यात्मिकता में भी नशे से मुक्ति का हल खोजना चाहिए बहुत से संत हैं जो इस मुहिम में कार्य कर रहे हैं जैसे संत रामपाल जी महाराज द्वारा नाम दीक्षा लेने वाले समस्त अनुयाई नाम दिक्षित होने के बाद ता जिंदगी कभी भी नशे को छूते भी नहीं है यह विश्लेषण मन मुखी ना होकर ग्राउंड रिपोर्ट द्वारा तैयार किया हुआ है हम तो यही आशा कर सकते हैं की संत हो चाहे भगवान इस बुराई का अंत होना ही चाहिए और होना ही चाहिए
धन्यवाद

Thursday, 7 May 2020




पृथ्वी पर जब से मानव सभ्यता का उदय हुआ है, तब से मानव विकास की इस अनवरत दौड़ में भागता ही पाया है| वर्तमान तक मानव सभ्यता के विकास के लिए प्रयत्नशील है क्या यह विकास, भौतिकता ही मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य हैं?  या अन्य,
 ऐसे अनेकों विचार आपके हृदय में उमड़ते रहे होंगे लेकिन जब मानव सभ्यता का विकास शुरू हुआ था और वर्तमान समय कि मानव का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो मानव अपनी इस विकास की दौड़ में खुद को भूल सा गया है क्या मनुष्य वैज्ञानिक तरीकों से ही जीवित रह सकता है या आध्यात्मिकता से
                   दोनों प्रकार के सवाल अपनी-अपनी जगह सही है लेकिन हृदय की असीम गहराइयों से सोचने के पश्चात दिमाग यह सोचने पर मजबूर होता है कि यह सब वैज्ञानिक या भौतिकवाद से परे चीजें हैं अर्थात आध्यात्मिकता का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है अतः सभी भौतिक वस्तुओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी देखना जरूरी है, क्या पता यही मनुष्य की अंतिम मंजिल हो
धन्यवाद

Wednesday, 6 May 2020



भारतीय समाज के संदर्भ में निष्पक्ष ‘वैज्ञानिक सत्य’ की ओर बढ़ना हो तो सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि सत्य एक नहीं अनेक हैं और प्रत्येक सत्य अपने आप में अपूर्ण है।
समाजशास्त्र क्षेत्र में सत्य की बहुलता एक समस्या है तो इसका समाधान है तुलना-नाना प्रकार की अवस्थितियों से उपजे अलग-अलग नजरियों को आमने-सामने करना।
दुसरे शब्दों में कहें तो समाजशास्त्र की स्वाभाविक मुद्रा तुलनात्मक होती है। समाजशास्त्र हमें पूर्वाग्रह-मुक्त करने का दावा तो जहीं करता बल्कि हममें अपने औरों के पूर्वाग्रहों को पहचानने की क्षमता विकसित करने का वादा करता है।

What Is the "Good Life?" How Positive Psychology Can Create Meaning
कुछ निश्चित समय के लिए मिला जीवन, जो पता नहीं कब खत्म हो जाए, या कह सकते है कि ज़िन्दगी पानी के एक बुलबुले के समान है जो कभी भी खत्म हो सकती है । तो क्यों न इस अनमोल जीवन का एक-एक पल जीया जाए । यह नहीं सोचना चाहिए कि जीवन में कितने पल है, अपितु यह सोच कर चलना चाहिए कि एक पल में कितना जीवन है । जो पल बीत गए, वे चले गए, फिर हाथ नहीं आने वाले ।
अब जरा सोचें जो पल बीत चुके वे हमने मजबूरी में काटे या उन्हें जीया । कही ऐसा तो नहीं कि उन्हें याद करके ही घबरा जाएँ । यदि ऐसा है तो हम अपने जीवन को जीवन नहीं कह सकते ।
कर दिए बरबाद यूं वरक-ए-किताब-ए-जिन्दगी, कुछ हमी नें फाड़ डाले, कुछ हवा में उड़ गए
What Is the Good Life? | Planet of Success
इस तरह अपनी जिन्दगी को बरबाद न करें । यह अनमोल है इसे जितना भी हो सके खुशियों से भर दें । चारों ओर खुशियाँ ही खुशियाँ हो और मुस्कुराहटें हों । इसी को जीना कहते है, तभी जिन्दगी सार्थक हो सकती है । अगर जिन्दगी में खुशी है तभी आप सही मायनों में जी रहे हो और खुशी तो आप छोटी से छोटी बात में भी ढूँढ सकते हो । अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम इसे कितना और कैसे प्राप्त करते है । याद रहे, दूसरों को खुशी देने से ही हमें सच्ची खुशी मिल सकती है ।
प्रयास करें कि हम अपने परिवार वालों और अपने परिजनों व परिचित लोगों को जिन-जिन के सम्पर्क में हम आते है सभी को दिल से चाहें, किसी से भी नफरत न करें । इस से दूसरों को तो तकलीफ पहुँचती ही है उस के पहले हमारा मन भी दु :खी होता है और दिलों में दूरियाँ बढ़ती है । जिस से भी मिले मुस्कुरा कर मिलें । क्या पता फिर मिलें कि न मिलें । हो सकता है यह हमारी आखिरी मुलाकात हो । इस आखिरी मुलाकात की याद कैसी हो, कड़वाहट भरी या प्यार भरी? यह सब हम स्वयं ही सोच सकते है ।
क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे मित्र, हमारे सगे-सम्बन्धी सिर्फ एक बार के लिए मिले है । इस संसार से जाने के बाद कोई किसी से दोबारा मिलने वाला नहीं, बिछुड़ जाएँगे सदा-सदा के लिए कभी दोबारा न मिलने के लिए । फिर चाहे हम लाख कोशिश कर लें, एक पल के लिए भी उन्हें नहीं मिल सकते । रह जाती है तो सिर्फ यादें और पछतावा, सदा-सदा के लिए ।

   
इन दिनों हमारे चारों तरफ बहुत तनाव है। अधिकांश लोग कार्यालय में समस्याओं, रिश्तों में मुद्दों और विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बारे में शिकायत करते हैं। लोग इन मुद्दों से निपटने में इतने तल्लीन हैं कि वे जीवन की वास्तविक सुंदरता को नहीं देखते हैं। इन चीजों की तुलना में जीवन में बहुत कुछ है।
वास्तव में, यदि हम जीवन को करीब से देखें, तो हम महसूस करेंगे कि यह कितना सुंदर है। भगवान ने हमें हर चीज की बहुतायत दी है। यह स्पष्ट है जब हम प्रकृति को देखते हैं। पेड़, पौधे, नदियाँ और धूप – सब कुछ बहुतायत में है और यही ऊर्जा हमारे भीतर रहती है। यही जीवन का सौंदर्य है।
हालांकि, यह कहना नहीं है कि जीवन गुलाब का बिस्तर है। यह नहीं! लोगों की समस्याएं और चिंताएँ वास्तविक हैं। अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित, सुंदर और इतने सुंदर नहीं – हर कोई समस्याओं के सेट पर है। जीवन किसी के लिए भी आसान नहीं है। हालांकि, हमें यह समझने की आवश्यकता है कि यह जीवन कैसा है।
अगर सब कुछ आसान हुआ तो हम वास्तव में इसकी कद्र नहीं करेंगे। जीवन अपने तरीके से सुंदर है और हमें इसका आनंद लेने के लिए कारणों की तलाश करनी चाहिए और उन मुद्दों के बीच अपनी सुंदरता को गले लगाना चाहिए, जिनसे हम निपट रहे हैं।