भारतीय समाज के संदर्भ में निष्पक्ष ‘वैज्ञानिक सत्य’ की ओर बढ़ना हो तो सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि सत्य एक नहीं अनेक हैं और प्रत्येक सत्य अपने आप में अपूर्ण है।
समाजशास्त्र क्षेत्र में सत्य की बहुलता एक समस्या है तो इसका समाधान है तुलना-नाना प्रकार की अवस्थितियों से उपजे अलग-अलग नजरियों को आमने-सामने करना।
दुसरे शब्दों में कहें तो समाजशास्त्र की स्वाभाविक मुद्रा तुलनात्मक होती है। समाजशास्त्र हमें पूर्वाग्रह-मुक्त करने का दावा तो जहीं करता बल्कि हममें अपने औरों के पूर्वाग्रहों को पहचानने की क्षमता विकसित करने का वादा करता है।

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