कर्म भर्म भारी लगे, संसा सूल बंबूल।
डाली पानो डोलते, परसत नाहीं मूल।।
🍁 सरलार्थ :- जब तक सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तब तक संशय बबूल के सूल (काँटे) के समान चुभता रहता है। कोई भी भ्रमित कर देता है। अपनी क्रिया पर शंका हो जाती है। दूसरे की क्रिया स्वीकार करना मुश्किल होता है। जब तक सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होता तो जो क्रिया कर रहा है, वे कठिन भी लगती हैं, जैसे बैठकर या खड़ा होकर हठ योग द्वारा तप, हरिद्वार से पैदल चलकर कावड़ लाना आदि-आदि, ये कठिन भी लगती हैं तथा भ्रम, अविश्वास भी रहता है। फिर साधक सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान के अभाव से संसार रूपी वृक्ष के मूल को न पूजकर डाली तथा पत्तों को पूजता डोल रहा है।
🍁 श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में तथा श्लोक 16-17 में बताया है कि यह संसार पीपल के वृक्ष के तुल्य जानो जिसकी मूल (जड़ें) तो ऊपर को हैं, वह तो पूर्ण परमात्मा मानो जो सर्व का सृजन करने वाला तथा धारण-पोषण करने वाला है। उसको गीता अध्याय 8 श्लोक 3,8,9,10 में परम अक्षर ब्रह्म कहा है। इसी का विवरण गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में भी है। फिर गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में आगे कहा है कि जो संत उस संसार रूपी वृक्ष के सब अंगों का ज्ञान करा देता है, वह वेदवित अर्थात् वेद के तात्पर्य को जानने वाला तत्वदर्शी संत है। इस वृक्ष की ऊपर को जड़ नीचे को शाखा हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 2-3 में बताया है कि इस संसार रूपी वृक्ष की तीनों गुण (रजगुण श्री ब्रह्मा जी, सतगुण श्री विष्णु जी तथा तमगुण श्री शिव जी) रूपी शाखाएं हैं जो ऊपर स्वर्ग लोक में तथा नीचे पाताल लोक तक फैली हैं। तीसरे पृथ्वी लोक पर यह गीता ज्ञान बोला जा रहा था क्योंकि श्री ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश जी की सत्ता एक ब्रह्माण्ड में बने तीनों लोकों पर ही है। इसलिए कहा है कि इनकी सत्ता पृथ्वी के अतिरिक्त ऊपर (स्वर्ग लोक में) तथा नीचे (पाताल लोक में) फैली है। ये ही तीनों देवता (तीनों गुण रूपी शाखा) प्रत्येक प्राणी को कर्मों के अनुसार संसार चक्र में बाँधने वाले मुख्य हैं।
🍁 गीता अध्याय 15 श्लोक 3 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि "इस संसार का वृक्ष जैसा स्वरूप है, पूर्ण रूप से मैं यहाँ विचार काल में अर्थात् मेरे द्वारा बताए जा रहे गीता ज्ञान में मैं तुझे नहीं बता पाऊंगा क्योंकि जैसी वास्तविक इस संसार रूपी वृक्ष की संरचना है, वैसी नहीं पाई जाती।
🍁 भावार्थ है कि गीता ज्ञान दाता को भी सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान नहीं है। उसके लिए गीता अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 में स्पष्ट किया है कि सम्पूर्ण यज्ञों अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञान स्वयं सच्चिदानन्द घन ब्रह्म (ब्रह्मणः) अपने मुख कमल से (मुखे) बोलकर कही वाणी में विस्तारपूर्वक कहता है, वह तत्वज्ञान है। (गीता अध्याय 4 श्लोक 32) फिर गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा है कि वह तत्वज्ञान तत्वदर्शी संतों से समझ, उनको दण्डवत करने से नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भली-भांति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तेरे को तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। इससे सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता को पूर्ण अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है। यदि होता तो एक अध्याय और बोल देता और कहता तत्वज्ञान उस अध्याय में पढ़ लेना।
🍁 गीता अध्याय 15 श्लोक 3 में गीता ज्ञान दाता ने स्पष्ट किया है कि अर्जुन! मैं तेरे को इस संसार रूपी वृक्ष के सम्पूर्ण भाग नहीं बता पाऊँगा क्योंकि इसकी स्थिति का आदि-अंत को मुझे ज्ञान नहीं है। इस अति दृढ़ मूल वाले संसार रूपी वृक्ष को तत्वज्ञान रूपी शस्त्र द्वारा काटकर अर्थात् अच्छी तरह समझकर।
🍁 [विशेष :- संसार रूपी वृक्ष की मूल (जड़ें) तो ऊपर का भाग बताया है जो ऊपर के चार अमर लोक हैं (1.सत्यलोक 2.अलख लोक 3.अगम लोक 4.अकह-अनामी लोक) ये अति दृढ़ अर्थात् अविनाशी हैं । इसलिए अति दृढ़ मूल वाला कहा है।]
🍁 गीता अध्याय 15 श्लोक 4 :- गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि तत्वदर्शी संत से तत्वज्ञान समझकर अर्थात् नौ मन सूत सुलझने के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के बाद साधक लौटकर कभी संसार में नहीं आते। जिस परमेश्वर से संसार रूपी वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है अर्थात् जिसने संसार की रचना की है, केवल उसी मूल रूप परमेश्वर की भक्ति करो।
🍁 इस श्लोक में गीता ज्ञान दाता ने स्पष्ट कर दिया है कि मेरी भक्ति भी छोड़, उस मूल मालिक परमेश्वर की भक्ति करो जैसा कि गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में तीन पुरूष (प्रभु) बताए हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में कहा है कि इस संसार में दो पुरूष हैं :-
1. क्षर पुरूष (यह केवल 21 ब्रह्माण्डों का प्रभु है।)
2. अक्षर पुरूष (यह केवल 7 शंख ब्रह्माण्डों का प्रभु (पुरूष) है। ये दोनों तथा इनके अंतर्गत जितने जीव हैं, वे सब नाशवान हैं, आत्मा तो किसी की नहीं मरती। (गीता अध्याय 15 श्लोक 16)
3. परम अक्षर पुरूष (यह कुल का मालिक है, संसार रूपी वृक्ष का मूल रूप प्रभु है। यह असंख्य ब्रह्माण्डों का मालिक तथा सृजनहार है।) इस परम अक्षर ब्रह्म का ज्ञान गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में है। कहा है :- "उत्तम पुरूष अर्थात् पुरूषोत्तम तो उपरोक्त क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष से अन्य ही है जो परमात्मा कहा जाता है जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है, वह वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है।
[विशेष :- यहाँ पर तीन लोकों का जो वर्णन है, वे लोक इस प्रकार हैं: 👇🏽
1. क्षर पुरूष का 21 ब्रह्माण्डों का क्षेत्र है जो काल लोक कहलाता है।
2. अक्षर पुरूष का 7 शंख ब्रह्माण्डों का क्षेत्र जो अक्षर पुरूष लोक कहलाता है।
3. परम अक्षर पुरूष के ऊपर के चार लोकों वाला क्षेत्र जो अमर लोक कहलाता है।]
🍁 इसलिए गीता अध्याय 15 के श्लोक 17 में कहा है कि परम अक्षर पुरूष तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है। अब संत गरीबदास जी की अमर वाणी नं.15 का शेष सरलार्थ करते हैं:
🍁 संत गरीबदास जी ने भी गीता वाले ज्ञान को दृढ़ किया है कि आप जी डालियों { शाखा रूपी तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी) की पूजा करते डोलते अर्थात् फिरते हो, आप मूल को नहीं पूज रहे। जिस कारण से मोक्ष फल से वंचित हैं।}(15)
🍁 धन्यवाद
🍁 मिलते हैं अगले ब्लॉग में 🍁

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